नौणी यूनिवर्सिटी में प्राकृतिक खेती आधारित बीज उत्पादन पर कार्यशाला

Photo of author

By Hills Post

सोलन: डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी में गुरुवार को सतत एवं लचीली कृषि हेतु प्राकृतिक खेती आधारित बीज उत्पादन विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का सफल आयोजन किया गया। इस महत्वपूर्ण कार्यशाला में चंबा, मंडी, सिरमौर, हमीरपुर, शिमला और सोलन जिलों की किसान उत्पादक कंपनियों (एफपीसी) के लगभग 200 किसानों ने हिस्सा लिया। इसके अलावा बीज संरक्षण से जुड़े गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि, आईसीएआर-एनबीपीजीआर शिमला और विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक भी इस मंथन में शामिल हुए।

प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राजेश्वर सिंह चंदेल ने बीजों को कृषि की आधारशिला और दीर्घकालिक स्थिरता की कुंजी बताया। उन्होंने प्राकृतिक खेती में बीज स्वायत्तता के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि इन बीजों का स्वामित्व और नियंत्रण पूरी तरह से किसानों के पास ही रहना चाहिए। कुलपति ने चिंता जताते हुए कहा कि स्थानीय बीज हमारे घरों और समुदायों से धीरे-धीरे लुप्त हो रहे हैं, इसलिए उन्हें संजोने, साझा करने और संरक्षित करने की पुरानी परंपरा को फिर से जीवित करना होगा। उन्होंने एफपीसी से सामूहिक ज्ञान को धरातल पर उतारने और किसान-नेतृत्व वाले बीज उद्यम विकसित करने का आह्वान किया।

एलायंस ऑफ बायोवर्सिटी इंटरनेशनल एवं सीआईएटी के कंट्री प्रतिनिधि डॉ. जे.सी. राणा ने बीज उत्पादन में आत्मनिर्भरता को सतत कृषि का मुख्य आधार बताया। उन्होंने हिमालयन एग्रोइकोलॉजी इनिशिएटिव (एचएआई) के रणनीतिक स्तंभों पर चर्चा करते हुए कहा कि खाद्य प्रणालियों को लचीला बनाने के लिए सार्वजनिक संस्थानों, निजी क्षेत्र और किसान समुदायों के बीच मजबूत सहयोग जरूरी है। वहीं, पद्मश्री से सम्मानित प्रगतिशील किसान नेक राम शर्मा ने स्थानीय कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप बीजों के संरक्षण पर बल दिया और कहा कि क्षेत्र-विशिष्ट देशी किस्मों को बढ़ावा देकर ही कई कृषि समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।

प्रसार शिक्षा निदेशक डॉ. इंदर देव और कार्यशाला समन्वयक डॉ. सुधीर वर्मा ने बताया कि इस पहल का मुख्य उद्देश्य हिमाचल प्रदेश में एफपीसी के माध्यम से प्राकृतिक खेती आधारित बीज उत्पादन को बढ़ावा देना और बाहरी इनपुट पर निर्भरता कम करना है। इसके तहत चयनित एफपीसी में सामुदायिक प्रबंधित बीज बैंक स्थापित किए जा रहे हैं। मिट्टी के घड़ों और कोठारों में बीज भंडारण जैसी पारंपरिक पद्धतियों को बेहतर वेंटिलेशन और सुव्यवस्थित लेबलिंग के साथ पुनर्जीवित किया जाएगा। इसके साथ ही देशी किस्मों का दस्तावेजीकरण और बीजामृत जैसे प्राकृतिक बीज उपचारों पर भी किसानों को प्रशिक्षित किया जा रहा है।

कार्यशाला के दौरान एग्रोइकोलॉजी और सामुदायिक बीज प्रणालियों पर कई विशेषज्ञ सत्र आयोजित किए गए, जिनमें ग्राम दिशा ट्रस्ट के आशीष गुप्ता, पहाड़ ट्रस्ट के अनूप कुमार और डॉ. सुभाष वर्मा ने अपने विचार रखे। इस अवसर पर एफपीसी द्वारा संरक्षित देशी बीज किस्मों की भव्य प्रदर्शनी भी लगाई गई और बीज संरक्षण में सक्रिय प्रगतिशील किसानों को सम्मानित किया गया। विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला कि यह पहल न केवल महंगे संकर बीजों पर किसानों की निर्भरता कम करेगी, बल्कि कृषि जैव-विविधता को पुनर्जीवित कर पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाएगी।

Photo of author

Hills Post

हम उन लोगों और विषयों के बारे में लिखने और आवाज़ बुलंद करने का प्रयास करते हैं जिन्हे मुख्यधारा के मीडिया में कम प्राथमिकता मिलती है ।