“मेरा नाहन, कितना बदल गया?”:”कद्दू की बेल पर संतरे” दिखाने वाला वो पुराना शहर, कहां खो गया

नाहन: “कभी नाहन की गलियों में चलते हुए हर दूसरा व्यक्ति मुस्कुरा कर हाथ मिलाता था, लोग एक-दूसरे के खानदान तक को जानते थे। आज पड़ोस की गली में कौन रहने आया है, पता ही नहीं चलता।” यह नाहन की एक कड़वी सच्चाई है। ऐतिहासिक शहर नाहन आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहाँ आधुनिक सुविधाओं का विस्तार तो है, लेकिन वो ‘पुराना अपनापन’ और ‘चेहरे की पहचान’ धीरे-धीरे खो रही है।

नाहन की बदलती डेमोग्राफी सबसे बड़ा बदलाव है। एक ओर जहाँ बाहरी क्षेत्रों (शिलाई, संगड़ाह, हरिपुरधार ) के युवाओं के लिए नाहन ‘सपनों का शहर’ बन चुका है, वहीं नाहन के मूल निवासी युवाओं का यहाँ से मोहभंग हो रहा है। स्थानीय युवा बेहतर जॉब प्रोफाइल और कॉर्पोरेट एक्सपोजर के लिए चंडीगढ़, दिल्ली और नोएडा जैसे बड़े शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। नाहन के अपने घरों में सन्नाटा बढ़ रहा है और बाहर से आए युवाओं की भीड़ गलियों में बढ़ रही है।

पुराने नाहनवासी मज़ाक और मेहमाननवाज़ी के शौकीन थे। निचले इलाकों से आए मेहमान जब नाहन की खड़ी चढ़ाइयों पर चलने से कतराते थे, तो स्थानीय लोग उन्हें “कद्दू की बेल पर संतरे” दिखाने का झांसा देकर पूरा शहर पैदल घुमा देते थे। आज गाड़ियाँ तो हर दरवाजे पर हैं, लेकिन वो पुराना हंसी-मज़ाक और पैदल चलने की वो संस्कृति अब गुम होती जा रही है। चौगान के इर्द-गिर्द जहाँ कभी सुकून की सैर होती थी, आज वहां हर मोड़ पर गाड़ियों का शोर और पार्किंग की जंग है।

नाहन की सबसे बड़ी खूबसूरती यहाँ का ‘सोशल नेटवर्क’ था। लोग एक-दूसरे के सुख-दुख के साथी थे। आज डिजिटल क्रांति और 5G के दौर में लोग एक ही शहर में, एक ही मोहल्ले में रहते हुए भी एक-दूसरे के लिए अजनबी होते जा रहे हैं। हाथ में मोबाइल है, फेसबुक पर हजारों दोस्त हैं, लेकिन पड़ोस के घर की खबर भी अब व्हाट्सएप स्टेटस से ही मिलती है।

अगर नाहन पर बढ़ती आबादी और भीड़ के सबसे बड़े कारण का विश्लेषण करें, तो वह यहाँ की शिक्षा का बदलता स्वरूप है। आज से 20 साल पहले जहाँ शहर में गिनती के एक-दो निजी स्कूल होते थे, आज वहां दर्जनों शिक्षण संस्थान खुल चुके हैं। इन स्कूलों और कॉलेजों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की तलाश में ऊपरी पहाड़ी इलाकों से लोग भारी संख्या में नाहन का रुख कर रहे हैं।

सिर्फ स्कूल ही नहीं, बल्कि नाहन अब एक ‘एजुकेशन और ट्यूशन हब’ के रूप में भी उभरा है। बाहरी क्षेत्रों से आए युवा यहाँ न केवल कोचिंग और उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, बल्कि छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपनी आजीविका भी खुद कमा रहे हैं। छात्रों और प्रवासियों की इस बढ़ती तादाद का ही नतीजा है कि आज नाहन में एक अदद कमरा किराए पर मिलना भी किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है।”

आज का नाहन स्मार्ट हो रहा है, पार्किंग की जंग लड़ रहा है और भीड़ में अपनी सादगी ढूंढ रहा है। क्या बड़ी इमारतें और सुविधाओं का जाल उस पुराने नाहन की जगह ले पाएगा जहाँ हर शख्स अपना था?

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पंकज जयसवाल

पंकज जयसवाल, हिल्स पोस्ट मीडिया में न्यूज़ रिपोर्टर के तौर पर खबरों को कवर करते हैं। उन्हें पत्रकारिता में करीब 2 वर्षों का अनुभव है। इससे पहले वह समाज सेवी संगठनों से जुड़े रहे हैं और हजारों युवाओं को कंप्यूटर की शिक्षा देने के साथ साथ रोजगार दिलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।