शिमला: हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) सेवा अवधि को पेंशन लाभ की गणना से बाहर रखने के आदेश पर बवाल मच गया है। हिमाचल प्रदेश राज्य कर्मचारी महासंघ ने सरकार के इस निर्णय का कड़ा विरोध करते हुए इसे कर्मचारी-विरोधी, अन्यायपूर्ण और असंवेदनशील करार दिया है।

महासंघ के प्रदेशाध्यक्ष नरेश ठाकुर, कार्यकारी अध्यक्ष चमन लाल कलवान, महासचिव उमेश कुमार, उपाध्यक्ष सुशील शर्मा और मंडी जिला अध्यक्ष हेत राम शर्मा ने एक संयुक्त बयान जारी कर सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों ने अनुबंध काल के दौरान नियमित कर्मचारियों की तरह ही पूरी निष्ठा से कार्य किया है, लेकिन अब पेंशन के समय उनकी उस सेवा को ‘शून्य’ मान लेना सरकार की दोहरी नीति और कर्मचारियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।
कर्मचारी नेताओं ने दो टूक शब्दों में कहा कि पेंशन कोई सरकार की कृपा नहीं, बल्कि कर्मचारी द्वारा दी गई लंबी सेवा के बदले उनका वैधानिक अधिकार है। अनुबंध सेवा को पेंशन लाभों से वंचित रखना सामाजिक न्याय, समानता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है। महासंघ का आरोप है कि सरकार जानबूझकर तकनीकी पेंच फंसाकर कर्मचारियों को उनके हक से वंचित करने का प्रयास कर रही है, जिसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
महासंघ ने राज्य सरकार को स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि इस आदेश को तुरंत प्रभाव से वापस नहीं लिया गया और अनुबंध सेवा को पेंशन गणना में शामिल नहीं किया गया, तो प्रदेश भर में कर्मचारी एक निर्णायक आंदोलन छेड़ने को मजबूर होंगे। नेताओं ने स्पष्ट किया कि इस आंदोलन से उत्पन्न होने वाली किसी भी परिस्थिति की संपूर्ण जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी। महासंघ ने सरकार से मांग की है कि इस विसंगति को दूर कर कर्मचारियों को तुरंत राहत प्रदान की जाए।