चम्बा : हिमाचल प्रदेश के जनजातीय क्षेत्र पांगी से वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरणविदों के लिए एक बेहद उत्साहजनक और बड़ी खबर सामने आई है। वन परिक्षेत्र किलाड़ के तहत आने वाली सुराल वन बीट के दुर्गम पहाड़ी जंगलों में एक ग्लेशियर को पार करते हुए अत्यंत दुर्लभ भूरा भालू (Brown Bear) देखा गया है। इस अद्भुत और दुर्लभ नजारे को क्षेत्र में मौजूद रिसर्च स्कॉलर प्रणव गोखले ने बड़ी कुशलता से अपने कैमरे में कैद किया है। डीएफओ (DFO) किलाड़ रवि कुमार गुलेरिया ने बताया कि रिसर्च स्कॉलर प्रणव गोखले वन विभाग की विशेष और आधिकारिक अनुमति लेकर इस उच्च हिमालयी क्षेत्र में वन्यजीवों पर विशेष शोध (Special Research) कार्य कर रहे हैं।
दुनिया भर से विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुकी भूरे भालू की यह विशिष्ट प्रजाति पांगी घाटी में सुरक्षित रूप से फल-फूल रही है, जो इस बात का सीधा प्रमाण है कि यहाँ का प्राकृतिक पर्यावरण और पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) आज भी बेहद समृद्ध और स्वस्थ है। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी क्षेत्र में भूरे भालू की सक्रिय मौजूदगी वहाँ की समृद्ध जैव-विविधता (Biodiversity) का सबसे शुभ संकेत मानी जाती है। इससे पहले इस दुर्लभ भालू की हलचल पांगी के ही सेचू नाला क्षेत्र में दर्ज की गई थी, और अब सुराल वन बीट के ऊंचे इलाकों में इसकी सक्रियता मिलने से वैज्ञानिकों और वन्यजीव प्रेमियों में खुशी की लहर दौड़ गई है।

इस अत्यंत दुर्लभ और संवेदनशील जीव की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए डीएफओ रवि कुमार गुलेरिया ने तत्काल प्रभाव से कड़े निर्देश जारी किए हैं। वन विभाग के फील्ड स्टाफ और कर्मचारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे सुराल और आसपास के संवेदनशील वन क्षेत्रों में लगातार और नियमित गश्त (Regular Patrolling) सुनिश्चित करें, ताकि किसी भी प्रकार के अवैध शिकार या मानवीय हस्तक्षेप की संभावना को पूरी तरह खत्म किया जा सके। गौरतलब है कि लगातार घटती वैश्विक संख्या के कारण सरकार ने भूरे भालू को अत्यधिक संरक्षित और दुर्लभ वन्यजीवों की श्रेणी में रखा है।
यह भालू आमतौर पर समुद्र तल से 3,000 से 5,000 मीटर की ऊंचाई वाले ठंडे और दुर्गम पहाड़ी इलाकों में निवास करते हैं और सर्दियों के दौरान लंबे समय तक भारी बर्फबारी के कारण शीतनिद्रा (Hibernation) में चले जाते हैं। भारत में यह मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश, लद्दाख, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड के उच्च हिमालयी इलाकों में पाए जाते हैं, जहाँ अवैध शिकार और जलवायु परिवर्तन इनके अस्तित्व के लिए सबसे बड़ी चुनौतियां बने हुए हैं। ऐसे में स्थानीय जनजातीय क्षेत्र पांगी के निवासियों के लिए इस दुर्लभ मेहमान की मौजूदगी जहाँ एक ओर बड़े गौरव की बात है, वहीं जंगलों और वन्यजीवों को सुरक्षित रखने की एक सामूहिक जिम्मेदारी भी है।