नाहन : उम्र केवल एक संख्या है, यदि मन में गुरु की भक्ति और शरीर में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो। लखनऊ के 50 वर्षीय शेषभूषण चौधरी इसका साक्षात प्रमाण हैं। 16 फरवरी को लखनऊ से अपनी साइकिल यात्रा शुरू करने वाले शेषभूषण, अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के दर्शन कर अब हिमाचल के ऐतिहासिक गुरुद्वारा पांवटा साहिब की ओर बढ़ रहे हैं। इसी कड़ी में वे नाहन क्षेत्र के ‘दो-सड़का’ पहुंचे, जहाँ से वे सीधे पांवटा साहिब के लिए रवाना हुए।
दो साल का इंतजार और ‘एकला चलो’ का संकल्प
शेषभूषण ने बताया कि स्वर्ण मंदिर और गुरुधामों की साइकिल यात्रा का विचार उनके मन में पिछले दो वर्षों से था। किसी साथी के न मिलने के कारण यात्रा टलती रही, लेकिन अंततः उन्होंने अकेले ही निकलने का साहसी फैसला लिया। नाहन के समीपवर्ती क्षेत्रों से गुजरते हुए उन्होंने साझा किया कि 50 वर्ष की आयु में इस कठिन सफर को तय करना उनके लिए अपनी शारीरिक क्षमता (Endurance) और स्वास्थ्य की सीमाओं को परखने का एक जरिया भी है।

गुरु कृपा और जन-जन का अटूट प्रेम
अपनी इस कठिन लेकिन सुखद यात्रा की सफलता का पूरा श्रेय वे गुरु गोविंद सिंह जी के परिवार के आशीर्वाद को देते हैं। सफर के दौरान बिताई गई सभी रातें उन्होंने मार्ग में आने वाले विभिन्न गुरुद्वारों में गुजारीं। नाहन क्षेत्र और रास्ते में मिलने वाले विभिन्न समुदायों के लोगों ने 50 की उम्र में उनके इस जज्बे को न केवल सराहा, बल्कि उन्हें भरपूर मान-सम्मान भी दिया। लोगों के लिए यह प्रेरणा का विषय रहा कि एक व्यक्ति पर्यावरण और स्वास्थ्य का संदेश लेकर अकेले ही इतनी लंबी यात्रा पर डटा हुआ है।
अयोध्या से नैनीताल और अब संपूर्ण भारत का लक्ष्य
पेशे से फ्रीलांसर और पार्टी आइटम्स का व्यापार करने वाले शेषभूषण का प्रकृति से गहरा जुड़ाव है। वे पूर्व में वृक्षारोपण जैसे कार्यों से जुड़े रहे हैं, लेकिन उनका मानना है कि पर्यावरण के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है। इससे पहले वे अक्टूबर में अयोध्या और जनवरी में नैनीताल की सफल यात्रा कर चुके हैं। नाहन के रास्ते पांवटा साहिब की ओर बढ़ते हुए उन्होंने हिल्स पोस्ट मीडिया से बातचीत में अपने भविष्य के लक्ष्य का भी खुलासा किया—वे साइकिल से भारत के सभी राज्यों का भ्रमण करना चाहते हैं।
साइकिलिंग: सेहत और सुकून का संगम
अपने माता-पिता के साथ रहने वाले शेषभूषण के लिए साइकिलिंग केवल एक खेल नहीं, बल्कि नए लोगों से मिलने, नई जगहों को खोजने और खुद को बेहतर महसूस करने का एक माध्यम है। स्वर्ण मंदिर में अरदास के बाद अब पांवटा साहिब की ओर बढ़ते उनके कदम उन तमाम लोगों के लिए एक मिसाल हैं, जो उम्र का बहाना बनाकर अपने सपनों को पीछे छोड़ देते हैं।