राजस्व घाटा अनुदान को समाप्त करना सरकार का नहीं, बल्कि राज्य की जनता के अधिकारों का मुद्दा: मुख्यमंत्री

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By Hills Post

शिमला: हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू ने रविवार को राज्य की वित्तीय स्थिति पर एक अहम प्रस्तुति के बाद गहरी चिंता व्यक्त की। 16वें वित्त आयोग द्वारा राजस्व घाटा अनुदान (RDG) को समाप्त करने के निर्णय को राज्य की आर्थिकी पर एक बड़ा प्रहार बताते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि इसका असर केवल वर्तमान सरकार पर ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ेगा।

वित्त विभाग द्वारा दी गई प्रस्तुति में खुलासा हुआ कि आरडीजी बंद होने से राज्य के सामने गंभीर संसाधन संकट खड़ा हो गया है, क्योंकि राज्य के बजट का 12.7 प्रतिशत हिस्सा इसी अनुदान से आता था। सीएम सुक्खू ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस मुद्दे पर भाजपा सांसदों और विधायकों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने की इच्छा जताई, हालांकि प्रस्तुति के दौरान भाजपा विधायकों की अनुपस्थिति पर उन्होंने खेद भी व्यक्त किया।

वित्त विभाग के प्रधान सचिव देवेश कुमार ने आंकड़ों के जरिए स्थिति की गंभीरता को उजागर किया। उन्होंने बताया कि वर्तमान में राज्य की अपनी आय लगभग 18,000 करोड़ रुपये है, जबकि वेतन, पेंशन और ऋण ब्याज जैसे प्रतिबद्ध खर्च (Committed Expenditure) लगभग 48,000 करोड़ रुपये हैं। आरडीजी समाप्त होने के कारण वित्त वर्ष 2026-27 के लिए विकास कार्यों को छोड़कर ही लगभग 6,000 करोड़ रुपये का वित्तीय अंतर (Gap) सामने आ रहा है। मुख्यमंत्री ने बताया कि जीएसटी लागू होने के बाद राज्य की कर संग्रह दर 14% से घटकर 8% रह गई है, जिससे ‘उत्पादक राज्य’ होने के बावजूद हिमाचल को नुकसान हुआ है।

संकट से उबरने के लिए मुख्यमंत्री ने केंद्र से मांग की है कि जिन बिजली परियोजनाओं का ऋण चुकता हो चुका है, उन पर राज्य को 50% रॉयल्टी दी जाए और 40 वर्ष पुरानी परियोजनाओं (जैसे शानन प्रोजेक्ट) को राज्य को वापस सौंपा जाए। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद बीबीएमबी (BBMB) से 4,500 करोड़ रुपये का एरियर अभी तक नहीं मिला है। उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान ने कहा कि वित्त विभाग के सुझावों पर अंतिम निर्णय मंत्रिमंडल लेगा, लेकिन सरकार जनता पर बोझ डाले बिना संसाधन जुटाने और अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए प्रतिबद्ध है।

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