संकट से जूझ रही भारतीय प्रेस परिषद: अध्यक्ष पद खाली और पत्रकारों की 13 सीटें रिक्त

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By नव ठाकुरिया

नई दिल्ली: दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में पत्रकारिता के मानकों की निगरानी करने वाली सर्वोच्च वैधानिक संस्था, भारतीय प्रेस परिषद (Press Council of India – PCI) इन दिनों गंभीर अस्तित्वगत और नेतृत्व संकट का सामना कर रही है। स्थिति यह है कि एक अर्ध-न्यायिक निकाय होने के बावजूद परिषद वर्तमान में बिना अध्यक्ष के कार्य कर रही है।

पूर्व अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई का कार्यकाल (विस्तारित अवधि सहित) 16 दिसंबर 2025 को समाप्त हो चुका है और उन्हें आठवें वेतन आयोग का जिम्मा सौंपा जा चुका है। इसके बावजूद, सरकार ने अब तक नए अध्यक्ष की नियुक्ति की कोई घोषणा नहीं की है। विडंबना यह है कि पीसीआई की आधिकारिक वेबसाइट पर आज भी न्यायाधीश देसाई को ही अध्यक्ष के रूप में दर्शाया जा रहा है, जो प्रशासनिक सुस्ती को उजागर करता है।

संकट केवल शीर्ष नेतृत्व तक सीमित नहीं है, बल्कि परिषद की 15वीं काउंसिल का ढांचा भी अधूरा पड़ा है। कुल 28 सदस्यीय परिषद में पेशेवर पत्रकारों का प्रतिनिधित्व करने वाले 13 महत्वपूर्ण पद रिक्त हैं। नियमानुसार, इनमें 6 संपादक और 7 कार्यरत पत्रकार होने चाहिए, जो मीडिया की स्वतंत्रता और नैतिकता के प्रहरी माने जाते हैं। वर्तमान में परिषद में केवल राज्यसभा और लोकसभा के सांसद (जैसे सुधांशु त्रिवेदी, संबित पात्रा आदि), बार काउंसिल, यूजीसी और समाचार पत्र मालिकों के प्रतिनिधि ही शामिल हैं। पत्रकारों के प्रतिनिधित्व के बिना परिषद की वैधानिक संरचना अधूरी मानी जा रही है, जिससे इसके फैसलों और कार्यप्रणाली की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

इस गतिरोध का एक मुख्य कारण पीसीआई के नियमों में प्रस्तावित संशोधन और उसे लेकर चल रही कानूनी लड़ाई है। दरअसल, नए नियमों के तहत प्रतिनिधियों के चयन में प्रेस क्लबों को शामिल करने का प्रस्ताव था, जिसका कई राष्ट्रीय मीडिया संगठनों ने विरोध किया और मामला अदालत में चला गया।

संगठनों का तर्क है कि प्रेस क्लब मूलतः सामाजिक संस्थाएं हैं और वे पेशेवर पत्रकार यूनियनों की तरह व्यापक प्रतिनिधित्व नहीं करते। इस कानूनी पेच के कारण 15वीं काउंसिल का गठन अधर में लटका हुआ है। वर्तमान में भारत में 1 लाख से अधिक पंजीकृत प्रकाशन हैं, ऐसे में निगरानी संस्था का पंगु होना चिंताजनक है। विश्लेषकों का मानना है कि डिजिटल और टीवी मीडिया को पीसीआई के दायरे में लाने की बहस से पहले, सरकार को इस संस्था के मौजूदा रिक्त पदों को भरकर इसे पुनर्जीवित करना होगा।

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नव ठाकुरिया

लेखक गुवाहाटी स्थित एक पत्रकार हैं, जो विश्व भर के विभिन्न मीडिया संस्थानों के लिए नियमित रूप से लेखन करते हैं।