शिमला: हिमाचल प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर अब पूरी तरह बदलने वाली है। पहाड़ के लोगों को गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए अब चंडीगढ़ या दिल्ली के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की सरकार ने अस्पतालों को हाई-टेक बनाने के लिए 3,000 करोड़ रुपये की महायोजना तैयार की है। इसके पहले चरण के लिए 1,617 करोड़ रुपये मंजूर भी कर दिए गए हैं। यह परियोजना 1 अप्रैल 2026 से शुरू होकर 2031 तक चलेगी।

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि सुविधाओं की कमी के कारण हर साल हिमाचल के करीब 9.5 लाख मरीज इलाज के लिए राज्य से बाहर जाते हैं। इससे न सिर्फ मरीजों की जेब पर बोझ पड़ता है, बल्कि प्रदेश को भी सालाना 1,350 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान (GDP Loss) होता है। सरकार का लक्ष्य है कि ये सुविधाएं राज्य के भीतर ही मिलें, जिससे सालाना करीब 550 करोड़ रुपये की बचत हो सके।
तीन चरणों में ऐसे बदलेगी सूरत
सरकारी मेडिकल कॉलेजों में नई बिल्डिंग्स, डिजिटल लाइब्रेरी और स्किल लैब्स बनेंगी। एमआरआई (MRI), सीटी स्कैनर और मॉलिक्यूलर लैब जैसी आधुनिक मशीनें लगेंगी। एआई (AI) आधारित हैंडहेल्ड एक्स-रे मशीनें और टेलीमेडिसिन की सुविधा शुरू होगी।
आईजीएमसी शिमला, चमियाना और हमीरपुर मेडिकल कॉलेज में किडनी और बोन मैरो ट्रांसप्लांट, न्यूरोसर्जरी और हार्ट सर्जरी की सुविधाएं बढ़ाई जाएंगी। सबसे खास बात यह है कि यहां रोबोटिक सर्जरी और 3D इमेजिंग जैसी तकनीकें लाई जाएंगी।
जिला स्तर के आदर्श स्वास्थ्य संस्थानों को सीटी स्कैनर, अल्ट्रासाउंड और लेप्रोस्कोपिक सिस्टम से लैस किया जाएगा और उन्हें बड़े अस्पतालों से डिजिटल नेटवर्क के जरिए जोड़ा जाएगा।
मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा कि इलाज में देरी से बीमारी तो गंभीर होती ही है, साथ ही खर्चा भी 30 से 50 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। इसलिए सरकार की प्राथमिकता है कि दुर्गम और दूरदराज के क्षेत्रों तक स्पेशलिस्ट डॉक्टर और आधुनिक मशीनें पहुंचें। टांडा और चमियाना में रोबोटिक सर्जरी की शुरुआत इसका प्रमाण है।