नाहन : नाहन के ऐतिहासिक चौगान मैदान में आयोजित सिरमौर क्रिकेट कप इन दिनों न केवल खेल प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है, बल्कि यहाँ पहली बार सिरमौर के प्राचीन और प्रसिद्ध पारंपरिक व्यंजन ‘सिरमौरी मुड़े’ का स्टाल भी अपनी विशेष पहचान बना रहा है। स्थानीय ब्लॉगर और सामाजिक कार्यकर्ता प्रीतिका नंबरदार द्वारा लगाया गया यह स्टाल खेल के रोमांच के बीच लोगों को अपनी जड़ों और संस्कृति से जोड़ने का प्रयास कर रहा है।
प्रीतिका का कहना है कि आज के दौर में गिरिपार क्षेत्र के बहुत से लोग शहरों में बस गए हैं। हालांकि वे शहरों में रह रहे हैं, लेकिन आज भी इस पारंपरिक स्वाद को भूले नहीं हैं। समस्या यह है कि शहरों की भागदौड़ में इसे बनाने का समय नहीं मिल पाता, इसलिए लोग आज भी इसे गांवों से ही बनवाकर मंगवाते हैं। प्रीतिका बताती हैं कि नई पीढ़ी धीरे-धीरे इस कला को भूलती जा रही है, इसीलिए उन्होंने इसे व्यावसायिक रूप देने की कोशिश की है ताकि यह व्यंजन हर घर तक आसानी से पहुँच सके।

उन्हें यह काम शुरू करने की प्रेरणा उत्तराखंड के प्रसिद्ध ‘नमक’ से मिली। प्रीतिका ने सोचा कि जब सामान्य नमक को सही पहचान और पैकेजिंग के साथ बेचा जा सकता है, तो ‘मुड़ा’ जैसा बेहतरीन व्यंजन क्यों नहीं, जो कि गिरिपार के हर त्योहार जैसे शादी, बूढ़ी दिवाली, माघ और जागरण में स्नैक्स के तौर पर अनिवार्य रूप से बनाया जाता है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि एक बार भूनने के बाद यह साल भर तक खराब नहीं होता, बस इसे सीलन (नमी) से बचाना पड़ता है।
इस व्यंजन को तैयार करने की प्रक्रिया काफी लंबी है। सबसे पहले गेहूं को उबालकर 8 से 10 दिनों तक सुखाया जाता है, फिर उसे भूना जाता है। इसके बाद इसमें नमक और मुरमुरा मिलाया जाता है। खास मौकों के लिए इसमें अखरोट भी शामिल किया जाता है, जिससे इसका स्वाद लाजवाब हो जाता है।
वर्तमान में यह स्टाल पर 50 रुपये में 300 ग्राम के पैकेट में उपलब्ध है। हालांकि अभी यह बिना अखरोट के मिल रहा है, लेकिन प्रीतिका का कहना है कि ग्राहकों की मांग पर वे जल्द ही ‘अखरोट वाला मुड़ा’ भी उपलब्ध कराएंगी। एक ब्लॉगर होने के नाते वे सोशल मीडिया के माध्यम से भी इसे प्रमोट कर रही हैं ताकि सिरमौर का यह पारंपरिक स्वाद सात समंदर पार तक अपनी पहचान बना सके। प्रीतिका का मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि अपनी लुप्त होती संस्कृति को नई पहचान दिलाना है।