शिमला: हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (HPU) ने राज्य के शैक्षणिक ढांचे में एक युगांतकारी परिवर्तन करते हुए विभिन्न राजकीय महाविद्यालयों के सहायक और एसोसिएट प्रोफेसरों को आधिकारिक रूप से PhD सुपरवाइजर के रूप में मान्यता दे दी है। अधिष्ठाता अध्ययन कार्यालय (Dean of Studies) द्वारा जारी यह अधिसूचना न केवल कॉलेज कैडर के शिक्षकों की लंबे समय से लंबित मांग को पूरा करती है, बल्कि राज्य में शोध की दिशा और दशा बदलने की क्षमता भी रखती है।

यह निर्णय हिमाचल प्रदेश राजकीय महाविद्यालय शिक्षक संघ (HGCTA) के वर्षों के कड़े संघर्ष और निरंतर पैरवी का परिणाम है। संघ लगातार विश्वविद्यालय और कॉलेज कैडर के संकाय के बीच अनुसंधान योग्यताओं में समानता बनाए रखने की वकालत कर रहा था। इस ऐतिहासिक विकास पर प्रतिक्रिया देते हुए HGCTA के वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉ. सतीश ठाकुर ने कहा कि यह संघ की एक प्राथमिक और लंबे समय से लंबित मांग थी। राजकीय महाविद्यालयों के शिक्षकों में अपार शैक्षणिक और अनुसंधान क्षमता है। इस मान्यता से वे अब उन्नत शोध और मार्गदर्शन में प्रत्यक्ष योगदान दे सकेंगे, जिससे राज्य के उच्च शिक्षा विभाग में अनुसंधान तंत्र को अभूतपूर्व मजबूती मिलेगी।
इस मान्यता के बाद अब प्रदेश के दूर-दराज के राजकीय महाविद्यालयों में कार्यरत पात्र प्रोफेसर भी आधिकारिक रूप से डॉक्टरेट उम्मीदवारों का पर्यवेक्षण (Supervision) कर सकेंगे। साथ ही एचपीयू के मुख्य विभागों पर शोधार्थियों का अत्यधिक दबाव कम होगा। अब ग्रामीण और छोटे शहरों के कॉलेजों में भी उच्च स्तरीय शोध कार्य संभव हो पाएंगे।
अधिक सुपरवाइजर होने से प्रदेश के उन सैकड़ों मेधावी छात्रों को लाभ मिलेगा जो पीएचडी की सीटों की कमी के कारण शोध नहीं कर पा रहे थे। यह कदम हिमाचल प्रदेश को एक ‘नॉलेज हब’ के रूप में स्थापित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।