शिमला: राजधानी स्थित शिमला विश्वविद्यालय (एपीजी) के मंदिर परिसर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ के छठे दिन भक्ति, दर्शन, संस्कृति और प्रकृति संरक्षण का एक अनूठा संगम देखने को मिला। कथा के इस विशेष पड़ाव पर भगवान श्रीकृष्ण और माता रुक्मिणी के विवाह प्रसंग ने पूरे वातावरण को अलौकिक आनंद से भर दिया। इस पावन अवसर पर विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों, शिक्षकों सहित स्थानीय श्रद्धालुओं ने भारी संख्या में उपस्थिति दर्ज करवाई।

गुरुकुल पंचकुला से पधारे मुख्य कथावाचक स्वामी निवासाचार्य ने श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह प्रसंग का अत्यंत भावपूर्ण और जीवंत वर्णन किया। उन्होंने व्यासपीठ से प्रेम, समर्पण, मर्यादा और धर्म के गूढ़ अर्थ को समझाते हुए कहा कि सच्चा प्रेम वही है जिसमें त्याग, अटूट विश्वास और शुद्ध संस्कार जुड़े हों। उन्होंने स्पष्ट किया कि रुक्मिणी विवाह केवल एक पारंपरिक धार्मिक प्रसंग नहीं है, बल्कि यह आधुनिक जीवन में आदर्श संबंधों, निष्ठा और कर्तव्य पालन की गहरी प्रेरणा देता है।
प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए स्वामी निवासाचार्य ने वरुण देव की महिमा का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने आज के दौर की सबसे बड़ी चुनौती यानी जल संकट पर ध्यान आकर्षित करते हुए जल संरक्षण और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश दिया। स्वामी जी ने कहा कि जल केवल एक भौतिक संसाधन नहीं, बल्कि साक्षात देवता का रूप है और वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में “जल है तो कल है” का मंत्र अत्यंत प्रासंगिक हो चुका है। उन्होंने सनातन परंपरा में कलश स्थापना के महत्व को समझाते हुए कहा कि प्रत्येक शुभ कार्य में कलश को पूजना असल में जल और प्रकृति के प्रति हमारी कृतज्ञता का प्रतीक है।
कथा के दौरान स्वामी जी ने हनुमान, अंगद और माता अहिल्या के प्रसंगों के माध्यम से सेवा, सदाचार और समर्पण की महिमा का बखान किया। वहीं, ‘रास’ की दिव्य व्याख्या करते हुए उन्होंने इसे परमात्मा के प्रति आत्मा के निष्काम प्रेम और आत्मिक आनंद का प्रतीक बताया।
इसी कड़ी में वरिष्ठ कथावाचक रामवाड़ी ने विशेष रूप से विद्यार्थियों और युवाओं का मार्गदर्शन किया। उन्होंने युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि जीवन में सफलता पाने के लिए एक लक्ष्य, एक गुरु, एक मंत्र और एक भगवान के प्रति अडिग निष्ठा होनी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि जीवन में स्पष्ट उद्देश्य और कड़ा अनुशासन ही सफलता का असली आधार हैं।
कथा के अंतिम चरण में जैसे ही श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह का प्रसंग आया, पूरा मंदिर परिसर ढोल-नगाड़ों, दिव्य भजनों और “जय श्री कृष्ण” के जयकारों से गूँज उठा। श्रद्धालुओं और विद्यार्थियों ने फूलों की वर्षा के बीच इस उत्सव को बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया।
छठे दिन की इस कथा ने विद्यार्थियों को यह अमूल्य सीख दी कि वास्तविक शिक्षा केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति का संरक्षण करना, मानव सेवा, गुरु भक्ति, सामाजिक संस्कार और मर्यादा भी मानव जीवन के उतने ही महत्वपूर्ण हिस्से हैं। कथा के समापन पर सभी उपस्थित भक्तों में भव्य भंडारे का प्रसाद वितरित किया गया।