गुवाहाटी: असम सरकार द्वारा विश्व धरोहर स्थल काज़ीरंगा नेशनल पार्क और टाइगर रिज़र्व के आसपास इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) की सीमा को मौजूदा डिफॉल्ट 10 किलोमीटर से घटाकर 1 से 3 किलोमीटर तय करने की योजना पर राज्य में व्यापक बहस छिड़ गई है। मुख्यधारा की राजनीति से लेकर सोशल मीडिया और पर्यावरणविदों के बीच इस प्रस्ताव के समर्थन और विरोध में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

राज्य की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह केंद्र सरकार से काज़ीरंगा के आसपास 1 से 3 किलोमीटर का इको-सेंसिटिव ज़ोन अधिसूचित करने का औपचारिक अनुरोध करेगी। संरक्षित क्षेत्रों के चारों ओर बफर ज़ोन का उद्देश्य बड़े निर्माण कार्यों, शहरीकरण और खनन जैसी गतिविधियों को नियंत्रित कर मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकना होता है। काज़ीरंगा में कोई कृत्रिम सीमा या बाड़ न होने के कारण वार्षिक बाढ़ के दौरान वन्यजीव नेशनल हाईवे-715 (पुराना NH-37) को पार कर कार्बी आंगलोंग की सुरक्षित पहाड़ियों की ओर पलायन करते हैं।
विपक्षी दलों और कई वन्यजीव विशेषज्ञों ने 10 किलोमीटर के दायरे को घटाने का कड़ा विरोध किया है। असम प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के नेताओं ने आरोप लगाया कि बफर ज़ोन कम करने से वन्यजीवों की सुरक्षा खतरे में पड़ेगी और यह कदम बड़े कॉरपोरेट हितों को लाभ पहुँचाने के लिए उठाया जा रहा है।
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने प्रस्ताव का मजबूती से बचाव करते हुए कहा कि यह निर्णय सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के पूर्णतः अनुरूप है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शीर्ष अदालत के अनुसार ईएसजेड न्यूनतम 1 किमी और आवश्यकतानुसार 3 किमी तक बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि ईएसजेड का उद्देश्य पर्यटन अवसंरचना को रोकना नहीं, बल्कि प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों और अनियंत्रित खनन गतिविधियों पर लगाम लगाना है। असम भाजपा अध्यक्ष दिलीप सैकिया और मंत्री पीयूष हजारिका ने भी कहा कि वैज्ञानिक आधार पर तय 1 से 3 किमी का दायरा संरक्षण व्यवस्था को कमजोर नहीं करेगा।
वहीं, काज़ीरंगा के आसपास के गांवों के कई स्थानीय निवासियों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है। स्थानीय लोगों का तर्क है कि 10 किलोमीटर के कड़े प्रतिबंधों से ग्रामीण क्षेत्रों के विकास और आजीविका के अवसरों पर असर पड़ता है। उनका कहना है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों का संतुलन बनाकर चलना चाहिए और किसी भी नीति निर्धारण में दशकों से वन्यजीव संरक्षण में भागीदार रहे स्थानीय समुदायों के हितों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।