गुवाहाटी: असम की चुनावी राजनीति पारंपरिक रूप से विकास, पहचान, सुरक्षा और जातीय संतुलन के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है। लेकिन आगामी विधानसभा चुनावों से पहले राज्य के सबसे लोकप्रिय सांस्कृतिक आइकन जुबिन गर्ग की रहस्यमयी मौत सार्वजनिक विमर्श के बिल्कुल केंद्र में आ गई है।
19 सितंबर 2025 को सिंगापुर में हुए उनके असामयिक निधन और उसके बाद चली जांच व कानूनी प्रक्रियाओं ने असम की राजनीति को एक गहरी भावनात्मक धुरी दे दी है। भले ही राजनीतिक दल खुले तौर पर कलाकारों के नाम पर राजनीति न करने की बात करते हों, लेकिन निधन के कई महीनों बाद भी ज़मीनी स्तर और सोशल मीडिया पर न्याय की मांग लगातार उफान पर है। विशेषकर राज्य का युवा वर्ग इस मुद्दे को लेकर बेहद संवेदनशील और मुखर है।

विपक्ष का आक्रामक रुख और प्रियंका गांधी का दौरा
इस संवेदनशील मुद्दे पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व शर्मा को विपक्ष के कड़े हमलों का सामना करना पड़ रहा है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस मामले को सरकार की जवाबदेही से जोड़ते हुए ‘चार्जशीट 2026’ जारी की है। इसमें जुबिन की मौत की जांच पर सवाल उठाने के साथ-साथ बढ़ते सरकारी कर्ज़, कथित भ्रष्टाचार और अधूरे वादों जैसे मुद्दे भी शामिल किए गए हैं। यह राजनीतिक बहस तब और तेज़ हो गई जब कांग्रेस की वरिष्ठ नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने अपने असम दौरे के दौरान सोनापुर स्थित जुबिन के समाधि स्थल पर जाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। उन्होंने मुख्यमंत्री पर ध्रुवीकरण की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए स्पष्ट संदेश दिया कि महान कलाकारों की मौत पर राजनीति नहीं होनी चाहिए, हालांकि उनके इस कदम का चुनावी माहौल पर गहरा असर देखा गया।
जांच की दिशा और कानूनी उलझनें
कानूनी मोर्चे पर असम पुलिस की विशेष जांच टीम (SIT) ने सिंगापुर जाकर साक्ष्य जुटाए हैं। पुलिस ने कथित हत्या के मामले में आयोजकों, मैनेजर, बैंड सदस्यों और एक पारिवारिक सदस्य सहित सात लोगों को गिरफ्तार कर अदालत में हज़ार पन्नों से अधिक की विस्तृत चार्जशीट भी दाखिल कर दी है। इसके बावजूद, जनता में जांच की दिशा और गति को लेकर गहरा असंतोष है। मामले ने तब एक नया मोड़ लिया जब जुबिन के परिवार ने सीधे प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर विशेष अदालत के गठन और सुनवाई में तेज़ी लाने की मांग की। जुबिन की पत्नी गरिमा सैकिया गर्ग ने भी इस पूरे प्रकरण में उच्च स्तरीय हस्तक्षेप पर ज़ोर दिया है ताकि उठ रहे सवालों के स्पष्ट जवाब मिल सकें।
‘हत्या बनाम दुर्घटना’ का नैरेटिव
राजनीतिक भूचाल तब और बढ़ गया जब सिंगापुर पुलिस की कोरोनर जांच की रिपोर्ट सामने आई, जिसमें इस दुखद मौत का कारण डूबने से हुई दुर्घटना बताया गया और किसी भी प्रकार की आपराधिक साज़िश से साफ इनकार किया गया। इसके बाद कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं ने राज्य सरकार पर तीखे सवाल दागे कि यदि अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को कोई आपराधिक तत्व नहीं मिला, तो असम में शुरू से ही हत्या का नैरेटिव गढ़कर जनता को क्यों भ्रमित किया गया। वहीं, मुख्यमंत्री शर्मा ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि असम पुलिस की जांच पूरी तरह स्वतंत्र थी और मामला अदालत के विचाराधीन होने के कारण राजनीतिक अनुमानबाज़ी से बचना चाहिए। इसके बावजूद, सत्तारूढ़ दल भी इस मुद्दे के दबाव से अछूता नहीं है और सरकार समर्थकों द्वारा भी कई जगहों पर न्याय यात्राएं निकाली गई हैं।
चुनावी नतीजों पर संभावित असर
जुबिन गर्ग के प्रति संवेदना और न्याय की मांग अब केवल असम की सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अन्य हिस्सों से भी कई प्रमुख हस्तियों ने परिवार से मिलकर निष्पक्ष जांच की आवाज़ उठाई है। इसने इस मामले को केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी न रखकर एक व्यापक सार्वजनिक सरोकार बना दिया है। अब राजनीतिक विश्लेषकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह गहरा भावनात्मक मुद्दा आगामी मतदान व्यवहार को सीधे तौर पर प्रभावित करेगा। क्या जुबिन गर्ग का मामला राज्य में सत्ता-विरोधी लहर को धार देगा, या फिर चुनाव नज़दीक आते-आते यह अन्य राजनीतिक और विकास के मुद्दों के शोर में दब जाएगा।