कर्मचारियों को हाईकोर्ट जाने से रोकने का प्रावधान असंवैधानिक: नरेश ठाकुर

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By Hills Post

शिमला: हिमाचल प्रदेश राज्य कर्मचारी महासंघ ने प्रदेश सरकार द्वारा हाल ही में कर्मचारियों के तबादलों को लेकर जारी किए गए नए प्रशासनिक प्रावधानों पर कड़ा ऐतराज जताया है। महासंघ के प्रदेशाध्यक्ष नरेश ठाकुर ने सरकार के उस फैसले को पूरी तरह गैर-कानूनी और असंवैधानिक करार दिया है, जिसमें कर्मचारियों को तबादले के मामलों में सीधे उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) जाने से रोका गया है और ऐसा करने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।

नरेश ठाकुर ने जारी एक बयान में कहा कि किसी भी कर्मचारी को अपनी न्यायसंगत बात रखने या अन्याय के खिलाफ न्यायालय में याचिका दायर करने से रोकना, न्याय प्राप्त करने के उसके मूल अधिकार का सीधा हनन है। उन्होंने भारतीय संविधान का हवाला देते हुए कहा कि अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण) के तहत देश के प्रत्येक नागरिक को समानता और न्याय पाने का अटूट अधिकार प्राप्त है। न्यायालय की शरण लेना एक संवैधानिक अधिकार है, जिसे किसी भी सामान्य प्रशासनिक आदेश या संशोधन के माध्यम से सीमित या छीना नहीं जा सकता।

महासंघ के अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि प्रदेश सरकार ने व्यापक मार्गदर्शक सिद्धांत-2013 (Comprehensive Guiding Principles-2013) में संशोधन करते हुए फरवरी 2025 में एक नया पैरा 22(अ) जोड़ा है। यह नया प्रावधान कर्मचारियों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा प्रहार है।

नए नियम के तहत कार्रवाई का प्रावधान: सरकार के इस नए संशोधन के अनुसार, यदि कोई भी कर्मचारी अपने स्थानांतरण (तबादले) के खिलाफ विभाग या सरकार के समक्ष अपनी बात रखने के बजाय सीधे हाईकोर्ट का रुख करता है, तो उसे अनुशासनहीनता माना जाएगा। ऐसे कर्मचारियों के खिलाफ केंद्रीय सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1965 [CCS (CCA) Rules, 1965] तथा अन्य विभागीय नियमों के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।

नरेश ठाकुर ने प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार को कर्मचारियों की समस्याओं और शिकायतों का समय पर व्यावहारिक समाधान ढूंढना चाहिए, न कि उन्हें कानूनी रास्ता चुनने पर डराने या दबाने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने साफ किया कि यदि प्रशासनिक स्तर पर किसी कर्मचारी के साथ कोई अन्याय या पक्षपात होता है, तो कानून के दायरे में रहकर अदालत का दरवाजा खटखटाना उसका वैधानिक अधिकार है। इस अधिकार को बलपूर्वक छीनने का कोई भी प्रयास लोकतांत्रिक और सामाजिक मूल्यों के बिल्कुल खिलाफ है।

महासंघ ने सरकार से मांग की है कि कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए इस दमनकारी और असंवैधानिक संशोधन को तुरंत वापस लिया जाए, ताकि कर्मचारियों में पनप रहे असंतोष को दूर किया जा सके

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