नाहन : जिला मुख्यालय नाहन में निजी स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और उन पर सरकारी निगरानी को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। हाल ही में सामने आए एक मामले ने न केवल चिकित्सा विज्ञान के सिद्धांतों को चुनौती दी है, बल्कि मरीजों की जान को जोखिम में डालने वाली बड़ी लापरवाही की ओर भी इशारा किया है। यह पूरा मामला एक ही मरीज की अलग-अलग प्रयोगशालाओं (Laboratories) से आई रिपोर्ट्स में पाए गए जमीन-आसमान के अंतर से जुड़ा है।
मामले के अनुसार, एक मरीज का डायबिटीज स्कोर (HbA1c) मात्र 21 दिनों के अंतराल में 7.4% से गिरकर 4.1% पर पहुँच गया। गौरतलब है कि 28 मार्च 2026 को सरकारी अस्पताल के माध्यम से हुई जांच में यह स्कोर 7.4% दर्ज किया गया था। इसके विपरीत, 17 अप्रैल को एक नामी निजी लैब की रिपोर्ट ने इसे 4.1% बताया। चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि बिना किसी बड़े उपचार के इतने कम समय में HbA1c स्तर में इतनी भारी गिरावट आना वैज्ञानिक रूप से लगभग असंभव है, क्योंकि यह टेस्ट पिछले 90 दिनों का औसत शुगर स्तर दर्शाता है।

इस विसंगति की पुष्टि के लिए जब 22 अप्रैल को शहर की एक अन्य प्रतिष्ठित लैब में दोबारा जांच करवाई गई, तो परिणाम 7.3% (HbA1c) और फास्टिंग शुगर 152 mg% निकला। चौंकाने वाली बात यह है कि उसी दिन पहली निजी लैब द्वारा फिर से किए गए टेस्ट में HbA1c को 4.3% और औसत शुगर (eAG) को मात्र 77 mg/dL बताया गया। यह विसंगति सीधे तौर पर लैब की मशीनरी या टेस्टिंग प्रक्रिया में गंभीर तकनीकी खामी की ओर इशारा करती है। जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि इनमें से कम से कम एक लैब की रिपोर्ट पूरी तरह गलत और भ्रामक है। यह मामला केवल तकनीकी त्रुटि का नहीं, बल्कि मरीज की जान से जुड़े जोखिम का है।
इस पूरे प्रकरण में सबसे निराशाजनक पहलू जिला स्वास्थ्य विभाग और मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) कार्यालय का ढुलमुल रवैया रहा है। पीड़ित का आरोप है कि इस बारे में सूचित करने पर अधिकारी ने “हम चेक कर लेंगे, वैसे हम ज्यादा कुछ नहीं कर सकते” कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया। हैरानी की बात यह है कि साक्ष्यों के साथ 24 अप्रैल को भेजी गई औपचारिक ईमेल का भी विभाग ने 10 दिनों बाद तक कोई जवाब नहीं दिया है। वर्तमान में स्थिति यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इस विषय पर बात करने से बच रहे हैं, जिससे विभाग की कार्यप्रणाली और निजी लैब्स पर उनके नियंत्रण को लेकर जनता के बीच अविश्वास बढ़ रहा है।
यह मामला केवल एक व्यक्ति की सेहत का नहीं बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा का है। सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि अगर इस व्यक्ति ने दूसरी जगह से क्रॉस-चेक न करवाया होता, तो क्या होता? चिकित्सा जगत में डॉक्टर पूरी तरह से लैब रिपोर्ट्स पर ही निर्भर होते हैं। यदि कोई व्यक्ति केवल एक रिपोर्ट (जैसे कि 4.3% वाली) लेकर डॉक्टर के पास जाता, तो डॉक्टर उसे पूरी तरह सामान्य मान लेते, जबकि उसी समय दूसरी लैब की रिपोर्ट (7.3%) उसे पूरी तरह अलग स्थिति में दिखा रही थी, जिससे मरीज को गलत परामर्श या उपचार मिलने का खतरा पैदा हो सकता था। यह साफ़ है कि इनमें से कम से कम एक लैब की रिपोर्ट तकनीकी रूप से पूरी तरह गलत है।
नाहन की जनता अब प्रदेश सरकार से जवाब मांग रही है कि क्या इन निजी प्रयोगशालाओं की कोई जवाबदेही तय की जाएगी या जनता इसी तरह तकनीकी लापरवाही और भ्रामक रिपोर्टिंग के कारण अपनी सेहत को जोखिम में डालती रहेगी?