गुवाहाटी/जिनेवा: वर्ष 2025 मीडिया जगत के लिए एक काले अध्याय और रक्तरंजित साल के रूप में इतिहास में दर्ज हो गया है। जिनेवा स्थित वैश्विक मीडिया सुरक्षा संस्था प्रेस एम्ब्लेम कैंपेन (PEC) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों ने एक भयावह तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार, बीते वर्ष दुनिया के 31 देशों में कम से कम 165 पत्रकारों और मीडिया कर्मियों की हत्या कर दी गई। हालांकि यह आंकड़ा वर्ष 2024 में हुई 179 मौतों की तुलना में थोड़ा कम है, फिर भी इसे सदी की शुरुआत से अब तक के सबसे घातक वर्षों में से एक माना जा रहा है।

पीईसी के अध्यक्ष ब्लेज़ लेम्पेन ने चिंता जताते हुए कहा कि आधुनिक युद्धों में तेज गति और अदृश्य ड्रोन का बढ़ता इस्तेमाल युद्ध संवाददाताओं के लिए एक नया और गंभीर खतरा बन गया है, जिससे घायल पत्रकारों तक पहुंचना भी मुश्किल हो गया है।
वैश्विक स्तर पर मध्य पूर्व (Middle East) पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक क्षेत्र साबित हुआ, जहां 87 पत्रकारों ने अपनी जान गंवाई। इसमें अकेले गाजा पट्टी में 60 पत्रकार मारे गए, जो इजरायली सैन्य हमलों का शिकार हुए। अक्टूबर 2023 से अब तक वहां 221 फिलिस्तीनी पत्रकारों की मौत हो चुकी है। इसके अलावा लैटिन अमेरिका में 27, एशिया में 23, अफ्रीका में 16, यूरोप में 10 और अमेरिका में 2 पत्रकारों की हत्या हुई। रूस-यूक्रेन युद्ध में 9 पत्रकारों की जान गई, जबकि ड्रग माफिया से जूझ रहे मैक्सिको में 9 और गृहयुद्ध ग्रस्त सूडान में 8 पत्रकार मारे गए। यमन में एक ही हमले में 13 मीडियाकर्मियों सहित कुल 15 की मौत ने वैश्विक समुदाय को झकझोर कर रख दिया।
भारत और दक्षिण एशिया में भी स्थिति चिंताजनक रही। पीईसी के मुताबिक, भारत में 2025 के दौरान 6 पत्रकारों की हत्या हुई, जो 2024 के आंकड़े से अधिक है। जान गंवाने वाले भारतीय पत्रकारों में बस्तर (छत्तीसगढ़) से मुकेश चंद्राकर, इमलिया सुल्तानपुर (यूपी) से राघवेंद्र वाजपेयी, डिगलीपुर (अंडमान) से सहदेव डे, गुरुग्राम (हरियाणा) से धर्मेंद्र सिंह चौहान, भुवनेश्वर (ओडिशा) से नरेश कुमार और जोशीमठ (उत्तराखंड) से राजीव प्रताप सिंह शामिल हैं। इसके अलावा देहरादून के फ्रीलांस पत्रकार पंकज मिश्रा की संदिग्ध मौत ने भी सवाल खड़े किए। पड़ोसी देशों की बात करें तो पाकिस्तान और बांग्लादेश में 5-5 पत्रकारों की हत्या हुई, जबकि नेपाल में एक मामला सामने आया।
इन तमाम निराशाजनक खबरों के बीच भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र (North East India) उम्मीद की एक किरण और उल्लेखनीय अपवाद बनकर उभरा है। पिछले तीन दशकों में उग्रवाद और हिंसा के चलते 30 से अधिक पत्रकारों को खोने वाले पूर्वोत्तर भारत में वर्ष 2025 के दौरान एक भी पत्रकार की हत्या की घटना दर्ज नहीं की गई। त्रिपुरा, असम और मणिपुर जैसे राज्य, जहां पहले पत्रकारों पर हमले आम थे, वहां इस साल सुरक्षा का रिकॉर्ड अभूतपूर्व रहा।
विशेषज्ञों ने इसका श्रेय क्षेत्र में आई राजनीतिक स्थिरता, बेहतर कानून-व्यवस्था और केंद्र व राज्य सरकारों की सक्रिय भूमिका को दिया है। 2025 के आंकड़े यह साफ संकेत देते हैं कि बिना ठोस सुरक्षा तंत्र और राजनीतिक इच्छाशक्ति के पत्रकारिता लगातार खतरे में बनी रहेगी, हालांकि पूर्वोत्तर भारत ने यह साबित किया है कि सही नीतियों से सुरक्षित वातावरण संभव है।