गुवाहाटी: बांग्लादेश के इतिहास में 12 फरवरी 2026 का दिन बेहद अहम होने जा रहा है। देश में 13वें संसदीय चुनाव और जुलाई नेशनल चार्टर पर जनमत संग्रह एक साथ हो रहे हैं। राजनीतिक हिंसा, ध्रुवीकरण और मीडिया पर बढ़ते दबाव के बीच हो रहे इस चुनाव को बांग्लादेशी लोकतंत्र की अब तक की सबसे कठिन परीक्षा माना जा रहा है।

प्रोफेसर यूनुस की अपील
निर्णायक घड़ी में अंतरिम सरकार के प्रमुख और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता प्रोफेसर मुहम्मद यूनुस ने देश की 17 करोड़ जनता को संबोधित किया है। उन्होंने सभी दलों से निजी स्वार्थ छोड़कर देशहित सोचने की अपील की है। यूनुस ने साफ कहा कि लोकतंत्र में हार-जीत चलती रहती है, लेकिन असली मकसद एक न्यायपूर्ण और समावेशी बांग्लादेश बनाना होना चाहिए। उन्होंने खास तौर पर महिलाओं और युवाओं से निडर होकर वोट डालने का आह्वान किया है।
तारिक रहमान सबसे आगे, अवामी लीग रेस से बाहर
पश्चिमी मीडिया और चुनावी सर्वेक्षणों के मुताबिक, इस बार बीएनपी (BNP) नीत गठबंधन सबसे आगे है और पार्टी चेयरमैन तारिक रहमान अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं। 17 साल के निर्वासन के बाद ब्रिटेन से लौटे तारिक का स्वागत लाखों लोगों ने किया था। हाल ही में पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया के निधन के बाद बीएनपी के पक्ष में एक सहानुभूति की लहर भी देखी जा रही है। गौरतलब है कि अपदस्थ पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग इस चुनावी प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर है।
दुनिया भर की नजरें, लेकिन UN नदारद
चुनाव में पारदर्शिता के लिए ढाका ने भारत, कनाडा, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और जापान समेत कई देशों को न्योता दिया है। करीब 540 विदेशी पर्यवेक्षक और पत्रकार इस प्रक्रिया को कवर करेंगे। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र (UN) ने देश की आंतरिक अस्थिरता का हवाला देते हुए अपने पर्यवेक्षक भेजने से इनकार कर दिया है।
मीडिया की सुरक्षा पर सवाल
चुनावी शोर के बीच पत्रकारों की सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बन गया है। न्यूयॉर्क स्थित कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (CPJ) ने चेतावनी दी है कि पत्रकारों के लिए खतरा बढ़ा है। हाल ही में ‘द डेली स्टार’ और ‘प्रोथोम एलो’ के दफ्तरों पर हमले और पत्रकारों की गिरफ्तारियों ने भय का माहौल बना दिया है। सीपीजे ने बीएनपी और अन्य दलों से मीडिया की आजादी सुनिश्चित करने की मांग की है।
कल होने वाला यह मतदान सिर्फ सत्ता परिवर्तन का जरिया नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि तमाम दबावों और उथल-पुथल के बीच बांग्लादेश का लोकतंत्र खुद को कितनी मजबूती से खड़ा कर पाता है।