नई दिल्ली: लगातार राजनीतिक अस्थिरता और हिंसा के दौर से गुजर रहे बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को 13वीं जातीय संसद (नेशनल पार्लियामेंट) के लिए चुनाव होने जा रहे हैं। नोबेल शांति पुरस्कार विजेता डॉ. मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार की देखरेख में हो रहे इन चुनावों से अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी ‘अवामी लीग’ को बाहर कर दिया गया है। इसके चलते मुख्य विपक्षी दल ‘बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी’ (BNP) को स्पष्ट बढ़त मिलती दिखाई दे रही है। यह चुनाव जुलाई-अगस्त 2024 के उस खूनी जनविद्रोह के बाद हो रहा है, जिसमें 1,400 से अधिक लोगों की जान गई थी और हसीना सरकार का पतन हुआ था।

चुनाव आयोग के अनुसार, 299 संसदीय सीटों के लिए 51 राजनीतिक दलों के 1,980 उम्मीदवार मैदान में हैं। देश के लगभग 12.77 करोड़ मतदाता, जिनमें 45 लाख नए युवा मतदाता शामिल हैं, अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। सुरक्षा के मद्देनजर देशभर में करीब 9 लाख सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया है। हालांकि, चुनाव से पहले का माहौल बेहद तनावपूर्ण है। हाल ही में एक बांग्लादेशी अदालत ने शेख हसीना को मानवता के खिलाफ अपराधों का दोषी मानते हुए मृत्युदंड सुनाया है और यूनुस प्रशासन उनके प्रत्यर्पण की मांग कर रहा है। हसीना 5 अगस्त 2024 से भारत में शरण लिए हुए हैं, जिसे लेकर भारत और बांग्लादेश के राजनयिक संबंधों में खटास आ गई है।
मानवाधिकार संगठनों और भारतीय विदेश मंत्रालय की रिपोर्ट्स के अनुसार, बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की स्थिति चिंताजनक है। यूनुस सरकार के कार्यकाल में हिंदुओं, ईसाइयों और बौद्धों पर 2,900 से अधिक हमलों की घटनाएं दर्ज की गई हैं। हाल ही में युवा नेता शरीफ उस्मान बिन हादी की हत्या के बाद फैलाई गई अफवाहों ने भारत-विरोधी और सांप्रदायिक भावनाओं को और भड़का दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि 12 फरवरी का यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि हिंसा और गहरे सामाजिक विभाजन के बीच बांग्लादेश में लोकतंत्र और स्थिरता वापस लौट पाएगी या नहीं।