सोलन: 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में अपने अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेतरपाल की जयंती लॉरेंस स्कूल, सनावर में पूरे गर्व और श्रद्धा के साथ मनाई गई। विद्यालय परिसर में उनके नाम पर स्थापित खेतरपाल स्टेडियम में आयोजित एक विशेष श्रद्धांजलि सभा में 700 से अधिक विद्यार्थियों ने एकत्र होकर अपने इस गौरवशाली पूर्व छात्र को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इस गरिमामयी अवसर पर देशभक्ति, शौर्य और बलिदान की गूंज ने पूरे विद्यालय के वातावरण को भावपूर्ण बना दिया।

कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ विद्यालय की प्रधानाचार्या रुचि प्रधान दत्ता द्वारा वीर अरुण खेतरपाल की प्रतिमा पर पुष्पचक्र अर्पित करने के साथ हुआ। इस दौरान विद्यालय के बिगुल वादकों ने लास्ट पोस्ट की धुन बजाकर शहीद को सम्मान दिया। सभा में प्रेरणादायी संस्कृत प्रार्थनाओं और भावपूर्ण भाषणों के माध्यम से इस महान वीर की शौर्यगाथा का स्मरण किया गया। उपस्थित विद्यार्थियों को बताया गया कि किस प्रकार अरुण खेतरपाल का निस्वार्थ राष्ट्रप्रेम और अदम्य साहस आज भी सनावर की पीढ़ियों को कर्तव्य, सम्मान और देश के लिए सर्वस्व न्योछावर करने के मूल्यों को आत्मसात करने की प्रेरणा देता है।
सभा को संबोधित करते हुए प्रधानाचार्या रुचि प्रधान दत्ता ने कहा कि 1966 बैच के इस महान पूर्व छात्र का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची महानता जीवन की अवधि में नहीं, बल्कि उन मूल्यों में निहित होती है जिन्हें हम अपनाते हैं और जिस साहस के साथ हम राष्ट्र की सेवा करते हैं। उन्होंने युद्ध के मैदान में कहे गए शहीद के अमर शब्दों ‘नहीं, सर, मैं अपना टैंक नहीं छोड़ूँगा’ का विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह उद्घोष विद्यार्थियों को हर चुनौती का सामना दृढ़ संकल्प और मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण के साथ करने की प्रेरणा देता रहेगा। अरुण खेतरपाल की विरासत विद्यालय के इतिहास का मात्र एक अध्याय नहीं, बल्कि देशभक्ति का एक जीवंत प्रकाशस्तंभ है।
विद्यालय के वार्षिक संस्थापक दिवस समारोह के बीच आयोजित इस श्रद्धांजलि कार्यक्रम का एक और विशेष आकर्षण अरुण खेतरपाल के 1966 बैच के सहपाठियों की भावुक उपस्थिति रही। ये सभी पूर्व छात्र अपने डायमंड जुबली मिलन समारोह के अवसर पर अपने विद्यालय में पुनः एकत्र हुए थे, जिससे यह अवसर और भी अधिक ऐतिहासिक एवं स्मरणीय बन गया। समारोह का समापन उस अमर वीर को नमन करते हुए हुआ, जिसने देश के सुरक्षित कल के लिए अपना आज हंसते-हंसते न्योछावर कर दिया।