सिरमौर के जालग में कला दीक्षा श्रृंखला के मुखौटा निर्माण व नृत्य प्रशिक्षण का मूल्यांकन

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By Hills Post

राजगढ़: संगीत नाटक अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा संचालित कला दीक्षा श्रृंखला के अंतर्गत सिरमौर जिला के जालग गांव में आयोजित एक वर्षीय मुखौटा निर्माण एवं मुखौटा नृत्य प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफ़लतापूर्वक मूल्यांकन किया गया। उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ युवा पुरस्कार से सम्मानित युवा लोककलाकार गोपाल हाब्बी ने बताया कि यह प्रशिक्षण कार्यक्रम गुरु-शिष्य परम्परा के तहत उनके मार्गदर्शन में हाब्बी मानसिंह कला केन्द्र, जालग में आयोजित किया गया था।

इस अनूठे प्रशिक्षण कार्यक्रम को जमीनी स्तर पर सफल बनाने में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त लोककलाकार एवं वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर डॉ. जोगेन्द्र हाब्बी ने सह-गुरु के रूप में तथा प्रसिद्ध लोकगायक रामलाल वर्मा ने संगतकार के रूप में अपना महत्वपूर्ण सहयोग दिया। संगीत नाटक अकादेमी, नई दिल्ली की ओर से कला दीक्षा के प्रभारी दीपक जोशी, रविन्द्र किरार एवं नरवीर सिंह पझौता मूल्यांकन के लिए विशेष रूप से जालग गांव पहुंचे।

इस दौरान मूल्यांकन समिति में कई वरिष्ठ विशेषज्ञ शामिल रहे जिसमें जय प्रकाश चौहान, अध्यक्ष, पझौता स्वतंत्रता सेनानी समाज कल्याण समिति एवं वरिष्ठ सदस्य, पहाड़ी कलाकार संघ, चेतराम ठाकुर, वरिष्ठ लोकनर्तक एवं लोकनाट्य अभिनेता, धर्मपाल ठाकुर, प्रदेश के प्रसिद्ध लोकगायक।

मूल्यांकन के दौरान प्रशिक्षु युवा कलाकारों ने विशेषज्ञों की समिति के समक्ष पारंपरिक शैली में सजीव मुखौटे तैयार कर अपनी कलात्मक दक्षता का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। इसके साथ ही, कलाकारों ने हिमाचल की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर के प्रतीक ‘सिंहटू नाच’ और ‘डग्याली नाच’ जैसे पारंपरिक मुखौटा नृत्यों की बेहद प्रभावशाली और मनमोहक प्रस्तुतियाँ दीं, जिसे देखकर विशेषज्ञ भावविभोर हो गए।

कला दीक्षा योजना के इंचार्ज दीपक जोशी ने बताया कि इस श्रृंखला के माध्यम से संगीत नाटक अकादेमी देशभर में लगभग 80 गुरुओं के माध्यम से विभिन्न लोक एवं पारंपरिक कलाओं का संरक्षण कर रही है। इनमें लोकनृत्य, गायन, वादन, पारंपरिक वाद्ययंत्र निर्माण, पुतुल कला (कठपुतली) और मुखौटा निर्माण जैसी महत्वपूर्ण विधाएँ शामिल हैं।

उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया कि हिमाचल प्रदेश में इस महत्वाकांक्षी योजना के अंतर्गत केवल दो केंद्रों को चुना गया था। जिसमें पद्मश्री विद्यानंद सरैक के द्वारा लोकनृत्य एवं लोकनाट्य (ठोडा/करयाला आदि) का प्रशिक्षण दिया गया। जबकि गुरु गोपाल हाब्बी के द्वारा जालग में मुखौटा निर्माण एवं मुखौटा नृत्य की अनूठी विधा का प्रशिक्षण युवाओं को दिया गया।

दीपक जोशी ने कहा कि सदियों से हमारे लोकनाट्यों में मुखौटों का विशेष महत्व रहा है, लेकिन कुशल कारीगरों की कमी और युवाओं की घटती रुचि के कारण यह कला विलुप्त होने की कगार पर थी, जिसे इस मुहिम ने नया जीवन दिया है।

संस्थान के संचालक गोपाल हाब्बी ने संगीत नाटक अकादेमी, नई दिल्ली का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस सहयोग से क्षेत्र की लुप्त हो रही मुखौटा परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का ऐतिहासिक अवसर मिला है। हाब्बी मानसिंह कला केन्द्र का मुख्य उद्देश्य एक ऐसी युवा पीढ़ी तैयार करना है जो मंच पर नृत्य, गायन और वादन करने के साथ-साथ बैकस्टेज पारंपरिक मुखौटों को खुद अपने हाथों से बनाने की कला में भी पूरी तरह पारंगत हो। यह प्रयास देवभूमि की सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण रखने में मील का पत्थर साबित होगा।

इस गरिमापूर्ण अवसर पर पूर्व जिला परिषद सदस्या एवं कवयित्री शकुन्तला प्रकाश, शोधार्थी अजय ठाकुर सहित क्षेत्र के कई गणमान्य लोग और ग्रामीण उपस्थित रहे।

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