नाहन : हिमाचल प्रदेश का ऐतिहासिक शहर नाहन अपनी गौरवशाली रियासतकालीन परंपराओं के लिए जाना जाता है। यहाँ जहाँ एक ओर भव्य मंदिर और मस्जिदें अपनी सुंदरता बिखेरती हैं, वहीं एक ऐसा स्थान भी है जो जाति, पाति और मजहब की बेड़ियों को तोड़कर केवल इंसानियत का संदेश देता है। यह स्थान है- हज़रत लखदाता पीर साहेब की दरगाह।
सिरमौर रियासत के राजा कर्म प्रकाश के समय से स्थापित यह दरगाह सदियों से नाहन की पहचान है। मान्यता है कि इस दरगाह की नींव मुल्तान (अब पाकिस्तान) से लाए गए पीर साहेब के ‘तुरबत’ (मजार) की मिट्टी और ईंटों से रखी गई थी। तब से लेकर आज तक, यह स्थान न केवल मुस्लिम समुदाय बल्कि हिंदू, सिख और अन्य धर्मों के लोगों के लिए भी अटूट आस्था का केंद्र बना हुआ है।

दरगाह की देखरेख पिछले लगभग 300 वर्षों से पीरजादा परिवार द्वारा की जा रही है। वर्तमान में इस महान विरासत को परिवार की छठी पीढ़ी के प्रतिनिधि और नाहन मुस्लिम धर्म के अध्यक्ष गुल मन्नवर अहमद (बॉबी) गद्दीनशीन के रूप में संभाल रहे हैं। उनका मानना है कि दरगाह का द्वार हर उस इंसान के लिए खुला है जो सच्ची नीयत लेकर आता है। वे कहते हैं, “हमारा काम हर इंसान की खुशहाली के लिए दुआ करना है, और रब उन बुजुर्गों की मोहब्बत के सदके जायज दुआएं कबूल फरमाता है।”
स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं के बीच ऐसी सैकड़ों कहानियां प्रचलित हैं, जहाँ पीर साहेब के दर पर हाजिरी भरने से असंभव कार्य भी संभव हुए हैं। यहाँ आने वाले भक्तों का मानना है कि जिनके पास औलाद नहीं थी उन्हें संतान सुख मिला, असाध्य बीमारियों से राहत मिली और बेरोजगारों को रोजगार में बरकत हासिल हुई। यह सब उस परम शक्ति (रब) की मर्जी और इन नेक बुजुर्गों के प्रति लोगों की अटूट मोहब्बत का परिणाम माना जाता है।
आज के दौर में जहाँ समाज अक्सर बंटवारा देखता है, नाहन की यह दरगाह एक दीपक की तरह जल रही है, जो यह बताती है कि हम सब एक ही ईश्वर की संतान हैं। यहाँ लोग अपने-अपने तरीके से दुआ और पूजा-पाठ करते हैं, लेकिन सबका लक्ष्य एक ही होता है-शांति और खुशहाली।