नई दिल्ली: बांग्लादेश में राजनीतिक अनिश्चितता के बाद हुए 13वें आम चुनाव ने देश की सत्ता का समीकरण पूरी तरह बदल दिया है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने ऐतिहासिक वापसी करते हुए प्रचंड बहुमत हासिल किया है। पार्टी नेता तारिक रहमान के नेतृत्व में BNP ने 300 सदस्यीय संसद में 200 से अधिक सीटों पर कब्जा जमाया है। वहीं, जमात-ए-इस्लामी लगभग 70 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी है।

यह चुनाव इसलिए भी ऐतिहासिक रहा क्योंकि देश की सबसे पुरानी पार्टी अवामी लीग और उसकी नेता शेख हसीना (जो 5 अगस्त 2024 से भारत में निर्वासित हैं) इस प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर रहीं।
नोबेल विजेता डॉ. मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के लिए यह चुनाव एक बड़ी उपलब्धि साबित हुआ। पिछले 35 वर्षों में पहली बार मतदान के दिन चुनावी हिंसा में किसी की मौत नहीं हुई। करीब 60% मतदान दर्ज किया गया, जो बांग्लादेश के हालिया इतिहास में लोकतंत्र के प्रति लोगों के भरोसे को दिखाता है। हालांकि, ड्यूटी के दौरान और कतारों में खड़े होने के कारण प्राकृतिक वजहों से 7 लोगों की मृत्यु जरूर हुई।
भारत ने बांग्लादेश में हुए इस सत्ता परिवर्तन को व्यावहारिक कूटनीति के साथ स्वीकार किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारिक रहमान को उनकी जीत पर बधाई देने में देर नहीं की। वे बधाई देने वाले पहले वैश्विक नेता बने। इससे पहले, तारिक रहमान की मां और पूर्व पीएम खालिदा जिया के निधन पर भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ढाका जाकर शोक व्यक्त किया था, जिसने दोनों देशों के बीच जमी हुई बर्फ को पिघलाने का काम किया। चुनाव प्रचार के दौरान तारिक रहमान ने भारत विरोधी बयानबाजी से परहेज किया, जो भविष्य के संतुलित रिश्तों का संकेत है।
जुलाई-अगस्त 2024 के आंदोलन के बाद बनी अंतरिम सरकार ने अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया था। भारत में शरण लिए हुए शेख हसीना ने इस चुनाव को मजाक बताया है और नए सिरे से चुनाव की मांग की है। हसीना की भारत में मौजूदगी और बांग्लादेश में उन्हें मिली मृत्युदंड की सजा, भारत के लिए एक कूटनीतिक असमंजस की स्थिति पैदा कर रही है।
सत्ता परिवर्तन के बीच भारत की सबसे बड़ी चिंता बांग्लादेश में घटती हिंदू आबादी और उनकी सुरक्षा है। 1947 में जहाँ हिंदू आबादी 23% थी, वह अब 8% से भी कम रह गई है। जमात-ए-इस्लामी के मुख्य विपक्षी दल बनने और कट्टरपंथी तत्वों के उभार के बीच तारिक रहमान के लिए अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती होगी।