लाहौल-स्पीति के कुकुमसेरी में राजमाश पर खेत दिवस आयोजित

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By Hills Post

शिमला: चौधरी सरवण कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर के अधीन कृषि विज्ञान केंद्र, कुकुमसेरी लाहौल-स्पीति द्वारा जनजातीय उप-योजना के अंतर्गत आज राजमाश की फसल पर एक विशेष खेत दिवस’का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में क्षेत्र के लगभग 100 प्रगतिशील किसानों ने अत्यंत उत्साह के साथ भाग लिया और कृषि वैज्ञानिकों से महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त कीं।

कार्यक्रम का शुभारंभ कृषि विज्ञान केंद्र कुकुमसेरी के कार्यक्रम समन्वयक डॉ. सुभाष कुमार द्वारा किया गया। उन्होंने मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित चौधरी सरवन कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर के निदेशक अनुसंधान डॉ. विनोद शर्मा तथा अन्य वरिष्ठ वैज्ञानिकों व अतिथियों का गर्मजोशी से स्वागत किया। इसके अलावा, इस अवसर पर एनबीपीजीआर-आईसीएआर, नई दिल्ली की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. पद्मावती गणपत गोरे ने विशेष अतिथि के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

किसान गोष्ठी को संबोधित करते हुए परियोजना के प्रधान अन्वेषक डॉ. राकेश छाहोटा ने एक महत्वपूर्ण जानकारी साझा करते हुए बताया कि देशभर से एकत्रित की गई राजमाश की लगभग 4,000 उन्नत फसल पंक्तियों और किस्मों का वर्तमान में अनुसंधान केंद्र में गहन परीक्षण व मूल्यांकन किया जा रहा है। उन्होंने विश्वास दिलाया कि कड़े परीक्षण और मूल्यांकन के उपरांत जो किस्में सबसे बेहतर और उच्च गुणवत्ता वाली साबित होंगी, उन्हें भविष्य में व्यावसायिक खेती के लिए स्थानीय किसानों को उपलब्ध करवाया जाएगा।

विशेष अतिथि डॉ. पद्मावती गोरे ने राजमाश के बीज संरक्षण के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने किसानों से आह्वान किया कि वे अपनी पारंपरिक किस्मों का संरक्षण करें और विस्तृत मूल्यांकन के लिए उन्हें कृषि अनुसंधान केंद्र को उपलब्ध करवाएं। कार्यक्रम के दौरान वैज्ञानिकों डॉ. जोगिंदर पाल, डॉ. शेल्जा शर्मा, डॉ. नेहा शर्मा तथा डॉ. आशिता बिष्ट ने अपने-अपने विशेषज्ञता क्षेत्रों से जुड़े महत्वपूर्ण तकनीकी सुझाव किसानों के साथ साझा किए।

डॉ. प्रदीप कुमार ने राजमाश की वैज्ञानिक तरीके से पैकेजिंग और उसके विपणन के महत्व को समझाया। उन्होंने कहा कि बेहतर पैकेजिंग और सही विपणन रणनीतिक अपनाकर किसान अपनी उपज का बाजार में उचित और लाभकारी मूल्य प्राप्त कर सकते हैं। इसके साथ ही उन्होंने लाहौल घाटी में फसल विविधीकरण की संभावनाओं पर भी विस्तृत जानकारी दी।

कार्यक्रम समन्वयक डॉ. सुभाष कुमार ने केंद्र के माध्यम से संचालित की जा रही विभिन्न जनकल्याणकारी और कृषि से जुड़ी गतिविधियों की जानकारी दी तथा किसानों के साथ सीधा संवाद स्थापित किया।

कार्यक्रम के समापन अवसर पर मुख्य अतिथि एवं अनुसंधान निदेशक डॉ. विनोद कुमार शर्मा ने किसानों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने में राजमाश की खेती के महत्व पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि लाहौल घाटी में राजमाश की वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा देना क्षेत्र के किसानों की आय को दोगुना करने के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में एक बेहद महत्वपूर्ण और प्रभावी कदम साबित हो सकता है। कार्यक्रम के अंत में डॉ. नेहा शर्मा ने सभी अतिथियों, वैज्ञानिकों और किसानों का आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया।

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