सोलन: नगर निगम के चुनाव नतीजे कांग्रेस पार्टी के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं हैं। नगर निगम का दर्जा मिलने के बाद से अब तक यहाँ जीत को तरस रही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए यह परिणाम संजीवनी बनकर आए हैं।
सोलन नगर निगम के कुल 17 वार्डों में से भाजपा ने 10 पर एकतरफा जीत दर्ज कर स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया है। इसके विपरीत, कांग्रेस महज़ 6 वार्डों पर सिमट कर रह गई, जबकि 1 वार्ड निर्दलीय (आजाद) प्रत्याशी के खाते में गया है।

इस चुनाव में सबसे चौंकाने वाला और दिलचस्प मुकाबला वार्ड नंबर-3 (कथेड़) में देखने को मिला। यहाँ भाजपा से टिकट न मिलने पर बागी हुए युवा नेता गौरव राजपूत ने आजाद उम्मीदवार के रूप में चुनावी मैदान में ताल ठोकी थी और जनता ने उन्हें सिर-आंखों पर बिठाया।
गौरव राजपूत ने (450 वोट पाकर) न केवल भाजपा के आधिकारिक प्रत्याशी पियूष गर्ग (258 वोट) को मात दी, बल्कि कांग्रेस के बेहद वरिष्ठ नेता व वार्ड-17 के पूर्व पार्षद रहे सरदार सिंह ठाकुर (287 वोट) को भी करारी शिकस्त देकर राजनीतिक पंडितों को हैरान कर दिया।
सोलन में भाजपा की लहर का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नगर निगम सोलन की पहली मेयर रही कांग्रेस की कद्दावर नेता पूनम ग्रोवर को भी इस बार शिकस्त का मुंह देखना पड़ा है। उन्हें वार्ड नंबर-08 (शिल्ली रोड) से भाजपा के सुरेंद्र कुमार ने एक बेहद कड़े मुकाबले में महज 16 वोटों के अंतर से पराजित किया। सुरेंद्र कुमार को 680 और पूनम को 664 मत प्राप्त हुए।
कांग्रेस के भीतर मचे घमासान और अपनों की बगावत ने पार्टी को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाया, कांग्रेस की दूसरी मेयर रही ऊषा शर्मा का इस बार पार्टी ने टिकट काट दिया था। इससे नाराज होकर उन्होंने आजाद उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और 349 वोट हासिल कर कांग्रेस के आधिकारिक प्रत्याशी के समीकरण बिगाड़ दिए।
यहाँ कांग्रेस के आधिकारिक प्रत्याशी ईश्वर दत्ता को महज 335 वोट मिले। कांग्रेस और उसकी पूर्व मेयर (बागी) की इस आपसी लड़ाई का सीधा फायदा भाजपा की प्रियंका अग्रवाल को मिला, जो 419 मत हासिल कर विजेता बन गईं। टिकट कटने और इस पूरे घटनाक्रम से नाराज पूर्व मेयर ऊषा शर्मा ने रविवार को ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष (HPCC प्रेसिडेंट) को अपना इस्तीफा पत्र भेजकर आधिकारिक तौर पर कांग्रेस पार्टी छोड़ दी है।
जाहिर तौर पर, सोलन में कांग्रेस की इस हार के पीछे अंदरूनी गुटबाजी और बागियों को संभाल न पाना एक मुख्य वजह रही है, जिसका फायदा उठाकर भाजपा ने पहली बार इस नगर निगम की चाबी अपने हाथ में ले ली है।