चंबा : हिमाचल प्रदेश का सुदूर जनजातीय क्षेत्र पांगी, जो सर्दियों के 7 से 8 महीने भारी बर्फबारी के कारण पूरी दुनिया से कटा रहता है, वहाँ ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ आज भी पशुपालन ही है। पांगी घाटी के मुख्यालय किलाड़ में तैनात पशुपालन विभाग के सहायक निदेशक (Assistant Director) डॉ. सुरेंद्र ठाकुर ने एक विशेष साक्षात्कार में घाटी की अनूठी परंपराओं, भौगोलिक चुनौतियों और पशुपालकों के लिए चलाई जा रही सरकारी योजनाओं के बारे में Hills Post से विस्तार से बात की।
‘धोई’ और ‘प्रजा मंडल’ की अनूठी पारंपरिक व्यवस्था
भौगोलिक परिस्थितियों पर चर्चा करते हुए डॉ. ठाकुर ने कहा कि पांगी घाटी नवंबर से अप्रैल तक पूरी तरह से ‘लैंड लॉक’ हो जाती है और दुनिया से इसका संपर्क कट जाता है। परिवहन (Transport) की सुविधाएं सर्दियों में बेहद सीमित हो जाती हैं।

इस कठिन दौर से निपटने के लिए यहाँ के पूर्वजों ने एक बेहतरीन सामाजिक व्यवस्था विकसित की है। डॉ. ठाकुर ने बताया, “यहाँ मार्च से लेकर नवंबर के अंत तक पशुओं को खुले चरागाहों में रखा जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘धोई’ (Temporary Homes for Animals) कहा जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि पशु गांवों में खेती और फसलों को नुकसान न पहुँचाएं।”
खास बात यह है कि इस पूरी व्यवस्था को आज भी पांगी में ‘प्रजा मंडल’ व्यवस्था के तहत आपसी भाईचारे और कड़े नियमों के साथ चलाया जाता है। लोग अप्रैल से सितंबर के बीच सर्दियों के लिए चारे और घास का स्टॉक इकट्ठा करते हैं, क्योंकि नवंबर से अप्रैल तक पशु पूरी तरह से अंदर ही रहते हैं।
विटामिन ‘ए’ से भरपूर पांगी का ‘नेचुरल पीला मक्खन’
हाल ही में हुई पशुगणना के आंकड़ों का हवाला देते हुए डॉ. सुरेंद्र ठाकुर ने बताया कि आज की तारीख में पांगी घाटी में लगभग 9,000 गोवंशीय पशु हैं। यहाँ स्थानीय नस्लों के अलावा संकर (Cross-bred) नस्ल की गाय और ‘चूरी’ व ‘चूर’ (याक और गाय की संकर नस्ल) का पालन किया जाता है।
उन्होंने बताया कि यहाँ की गायओं के दूध से बनने वाले पारंपरिक देसी मक्खन में प्राकृतिक रूप से गहरा पीला रंग होता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसमें विटामिन ‘ए’ और ज़ेंथॉफिल (Xanthophyll) की मात्रा बहुत अधिक होती है। बाजार में मिलने वाले मक्खन में कृत्रिम रंग (Artificial Color) मिलाया जाता है, लेकिन पांगी का घी और मक्खन पूरी तरह से प्राकृतिक और औषधीय गुणों से भरपूर है।
पशुपालन पर माइग्रेशन और होम-स्टे कल्चर का असर
डॉ. ठाकुर ने साक्षात्कार में यह भी स्वीकार किया कि पिछले 10 वर्षों में पांगी घाटी में पशुओं की संख्या में गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2019 और वर्ष 2025 की पशुगणना के विश्लेषण से यह बात सामने आई है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
शिक्षा के लिए पलायन (Migration): घाटी के युवा अब बेहतर शिक्षा और भविष्य के लिए शिमला, चंबा, पालमपुर, धर्मशाला, चंडीगढ़ और दिल्ली जैसे शहरों का रुख कर रहे हैं, जिससे घरों में केवल बुजुर्ग ही रह गए हैं।
टूरिज्म और होम-स्टे: वैश्विक दौर में पांगी के अंदर पर्यटन (Tourism) का काफी विकास हुआ है। लोग अब ट्रेडिशनल फार्मिंग के साथ-साथ होम-स्टे और अन्य अलाइड एक्टिविटीज से जुड़ रहे हैं, जिससे पशुपालन की तरफ रुझान थोड़ा कम हुआ है।
महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रही हैं सरकारी योजनाएं
सीमित आजीविका संसाधनों वाले इस दुर्गम क्षेत्र में पशुपालन विभाग की योजनाएं ग्रामीण और विशेषकर महिला अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रही हैं:
बैकयार्ड पोल्ट्री स्कीम (आँगनवाड़ी कुक्कुट पालन):
इसके तहत विभाग हर साल घाटी में 10 से 15 हजार चूजे (Chicks) रियायती दरों पर वितरित करता है। पांगी में इस योजना का सबसे ज्यादा संचालन महिलाएं कर रही हैं। घाटी में एक देसी अंडा ₹15 से ₹20 में और देसी मुर्गा ₹500 तक बिकता है, जिससे ग्रामीण महिलाओं को घर बैठे बेहतरीन आमदनी हो रही है।
राष्ट्रीय कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रम (निशुल्क सेवाएं):
वर्ष 2019 से पहले कृत्रिम गर्भाधान के लिए ₹25 से ₹50 फीस ली जाती थी, लेकिन अब केंद्र और राज्य सरकार के सहयोग से पांगी में यह सेवा पूरी तरह निशुल्क (Free of Cost) है। नस्ल सुधार के लिए अब साहीवाल और रेड सिन्धी जैसी उच्च दुग्ध क्षमता वाली नस्लों के सीमन का उपयोग किया जा रहा है।
60% सब्सिडी पर पोल्ट्री फार्मिंग योजना:
प्रदेश सरकार की योजना के अंतर्गत पांगी घाटी में अब तक 6 पोल्ट्री फार्म पूरी तरह से फंक्शनल हो चुके हैं, जिन्हें विभाग द्वारा 60% अनुदान (Subsidy) दिया गया है। हालांकि, पांगी में कम वर्किंग सीजन (अप्रैल से 15 अक्टूबर तक, जब साच पास खुला रहता है) के कारण एक प्रोजेक्ट को पूरा होने में 3 से 4 साल का समय लग जाता है, लेकिन इसके परिणाम बेहद सकारात्मक आ रहे हैं।
अन्य कल्याणकारी योजनाएं:
डॉ. सुरेंद्र ठाकुर ने विशेष तौर पर बताया कि इन प्रमुख कार्यक्रमों के अलावा भी विभाग द्वारा पशुपालकों के कल्याण के लिए कई अन्य योजनाएं चलाई जा रही हैं, ताकि विपरीत भौगोलिक परिस्थितियों में भी किसानों को पशुपालन में किसी तरह की दिक्कत न आए और उनकी आजीविका सुरक्षित रहे।
डॉ. सुरेंद्र ठाकुर: शिमला से पांगी घाटी तक का सफर
अपनी प्रारंभिक शिक्षा और जीवन के सफर के बारे में बात करते हुए डॉ. सुरेंद्र ठाकुर ने बताया कि उनके माता-पिता शिमला में कार्यरत थे, जिसके कारण उनकी शुरुआती पढ़ाई शिमला के संजौली स्कूल से हुई। इसके बाद उन्होंने जवाहर नवोदय विद्यालय अमरु (हमीरपुर) से शिक्षा प्राप्त की।
वर्ष 2000 में उन्होंने चौधरी सरवन कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर के डॉ. जी.सी. नेगी कॉलेज ऑफ वेटरनरी एंड एनिमल साइंसेज में दाखिला लिया और वेटरनरी साइंस में ग्रेजुएशन की उपाधि प्राप्त की। वर्ष 2006 से वह पशुपालन विभाग में पशु चिकित्सा अधिकारी के रूप में सेवाएं दे रहे हैं और वर्तमान में वह पांगी घाटी में सहायक निदेशक (पशु स्वास्थ्य एवं प्रजनन) के पद पर तैनात रहकर अपनी बहुमूल्य सेवाएं दे रहे हैं।
डॉ. सुरेंद्र ठाकुर ने उम्मीद जताई कि पांगी की आने वाली युवा पीढ़ी अपनी इस समृद्ध पारंपरिक विरासत (पशुपालन और प्रजा मंडल व्यवस्था) को जीवित रखेगी। आधुनिक तकनीकों और सरकारी योजनाओं के सही इस्तेमाल से पांगी न केवल आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि यहाँ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा मिलेगी।