नाहन: डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी के अधीन कार्यरत क्षेत्रीय बागवानी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र धौलाकुआं में शुक्रवार को ‘लीची एवं आम दिवस’ का भव्य आयोजन किया गया। इस विशेष कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र के प्रगतिशील किसानों को इन दोनों महत्वपूर्ण फल फसलों की नवीनतम उत्पादन तकनीकों, उन्नत किस्मों तथा कटाई उपरांत (पोस्ट-हार्वेस्ट) प्रबंधन संबंधी वैज्ञानिक जानकारियां प्रदान करना था। कार्यक्रम में सिरमौर और आसपास के क्षेत्रों से आए सैकड़ों किसानों, कृषि वैज्ञानिकों तथा अन्य प्रमुख हितधारकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. हरमिंदर सिंह बवेजा इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए, जबकि अनुसंधान निदेशक डॉ. देविना वैद्य तथा विस्तार शिक्षा निदेशक डॉ. डी.पी. शर्मा ने विशिष्ट अतिथि के रूप में शिरकत की। कार्यक्रम में उपस्थित सभी प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए धौलाकुआं केंद्र की सह-निदेशक डॉ. प्रियंका ठाकुर ने कहा कि किसानों को उन्नत उत्पादन तकनीकों एवं कटाई उपरांत प्रबंधन के बारे में जागरूक कर उनकी उत्पादकता एवं लाभप्रदता बढ़ाना ही इस आयोजन की मुख्य प्राथमिकता है।
अपने संबोधन में कुलपति प्रो. बवेजा ने हिमाचल प्रदेश एवं निचले पहाड़ी क्षेत्रों में आम और लीची की खेती के आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए इन्हें किसानों की आर्थिकी बदलने वाली नकदी फसलें बताया। उन्होंने अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए पारंपरिक तरीकों को छोड़कर वैज्ञानिक बाग प्रबंधन एवं मूल्य संवर्धन (वैल्यू एडिशन) पर बल दिया। उन्होंने कहा कि सिट्रस (नींबू प्रजाति) फलों के बागों की उत्पादकता एवं लाभप्रदता बढ़ाना विश्वविद्यालय के अनुसंधान और प्रसार का प्राथमिक क्षेत्र होना चाहिए। इसके लिए उन्होंने किसानों के साथ मजबूत सहयोग स्थापित करने तथा किसानों के खेतों पर ही सहभागी अनुसंधान परीक्षणों को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया, जिससे स्थानीय स्तर पर आने वाली समस्याओं के व्यावहारिक समाधान और नई तकनीकों को जमीन पर उतारने में सहायता मिल सके।
बाजार से सीधे जुड़ाव के महत्व को रेखांकित करते हुए प्रो. बवेजा ने कृषि उपज मंडी समितियों (APMC) के साथ मिलकर विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रमों, प्रदर्शनियों और जागरूकता अभियानों के माध्यम से सहयोग बढ़ाने का सुझाव दिया, ताकि किसानों को बाजार की वास्तविक आवश्यकताओं, वैश्विक गुणवत्ता मानकों, ग्रेडिंग, पैकेजिंग और मूल्य संवर्धन की बेहतर जानकारी मिल सके। इसके साथ ही उन्होंने धौलाकुआं में बागवानी जर्मप्लाज्म के संरक्षण हेतु एक अत्याधुनिक ‘जीन बैंक’ स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया तथा ड्रैगन फ्रूट, एवोकाडो और स्ट्रॉबेरी जैसी उभरती हुई उच्च मूल्य वाली फल फसलों को अपनाने के लिए भी किसानों को प्रेरित किया।
इस कार्यक्रम के दौरान प्रो. बवेजा ने केंद्र परिसर में प्रस्तावित ‘नेचर पार्क’ की आधारशिला भी रखी। यह पार्क भविष्य में जैव विविधता संरक्षण, पर्यावरण शिक्षा और वैज्ञानिक अध्ययन का एक बड़ा केंद्र बनने के साथ-साथ विद्यार्थियों, शोधार्थियों और स्थानीय समुदाय के लिए एक बेहतरीन मनोरंजक स्थल के रूप में भी कार्य करेगा।
सत्र को आगे बढ़ाते हुए अनुसंधान निदेशक डॉ. देविना वैद्य ने राज्य के बागवानी विकास में धौलाकुआं केंद्र की महत्वपूर्ण भूमिका, विशेषकर सिट्रस फल अनुसंधान एवं किन्नू उत्पादन को बढ़ावा देने में इसके दशकों पुराने योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने सिट्रस बागों की गिरती उत्पादकता के कारणों की समयबद्ध पहचान के लिए व्यवस्थित अनुसंधान की आवश्यकता पर बल दिया। वहीं विस्तार शिक्षा निदेशक डॉ. डी.पी. शर्मा ने बेहतर आर्थिक लाभ के लिए उच्च मूल्य वाली फसलों की ओर कृषि विविधीकरण (डाइवर्सिफिकेशन) की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने सिरमौर जिले की विविध कृषि-जलवायु परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए क्षेत्र में लहसुन उत्पादन, उसके मूल्य संवर्धन, ब्रांडिंग तथा बेमौसमी सब्जियों की खेती की व्यापक संभावनाओं की ओर सबका ध्यान आकर्षित किया।
इस विशेष अवसर पर क्षेत्र के प्रगतिशील किसानों भूरा राम, जगीर चंद, निर्मल, प्रिंस और अक्षित को बागवानी के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने के लिए मुख्य अतिथि द्वारा सम्मानित किया गया। कार्यक्रम के अंतिम चरण में वैज्ञानिकों और किसानों के बीच एक सीधा संवाद सत्र भी आयोजित किया गया, जिसमें विशेषज्ञों ने उन्नत किस्मों, कीट एवं रोग प्रबंधन, कैनोपी मैनेजमेंट तथा कटाई उपरांत प्रबंधन संबंधी वैज्ञानिक गुर साझा किए, जबकि किसानों ने फल उत्पादन से जुड़े अपने मैदानी अनुभवों और आ रही व्यावहारिक समस्याओं पर चर्चा कर समाधान पाए।