गुवाहाटी: भारत का उत्तर-पूर्वी क्षेत्र (नॉर्थईस्ट) जो कभी अपनी अशांत परिस्थितियों और पत्रकारों पर होने वाले हमलों के लिए जाना जाता था, वहां से अब एक राहत भरी और सकारात्मक तस्वीर सामने आ रही है। पिछले तीन दशकों में जिस क्षेत्र ने अपराधियों और हमलावरों के हाथों अपने 30 से अधिक जांबाज संपादकों, रिपोर्टरों और संवाददाताओं को खोया था, वहां पिछले आठ वर्षों से किसी भी पत्रकार की हत्या का कोई मामला सामने नहीं आया है। वर्ष 2017 में हुई आखिरी सनसनीखेज हत्याओं के बाद से अब तक (मई 2026) यह क्षेत्र मीडियाकर्मियों की सुरक्षा के लिहाज से इस सकारात्मक बदलाव को बरकरार रखे हुए है।
नेपाल, भूटान, तिब्बत/चीन, म्यांमार और बांग्लादेश जैसी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से घिरे नॉर्थईस्ट की यह सुरक्षित स्थिति इसलिए भी खास है क्योंकि देश के अन्य हिस्सों में पत्रकारों के लिए खतरा अब भी बना हुआ है। पूरे भारत में औसतन हर साल 5 से 10 पत्रकारों को अपनी जान गंवानी पड़ती है।
बीते वर्ष देशभर में छह पत्रकारों की हत्या के मामले दर्ज किए गए। इनमें मुकेश चंद्रकार (NDTV, बस्तर-छत्तीसगढ़), राघवेंद्र वाजपेयी (दैनिक जागरण, इमालिया सुल्तानपुर-उत्तर प्रदेश), सहदेव डे (रिपब्लिक अंडमान, डिगलीपुर-अंडमान), धर्मेंद्र सिंह चौहान (फास्ट न्यूज इंडिया, गुरुग्राम-हरियाणा), नरेश कुमार (टाइम्स ओडिया, भुवनेश्वर-ओडिशा) और राजीव प्रताप सिंह (दिल्ली उत्तराखंड लाइव, जोशियारा-उत्तराखंड) शामिल हैं। इसके अलावा देहरादून के फ्रीलांस पत्रकार पंकज मिश्रा की मौत का संदिग्ध मामला भी सामने आया था।
साल 2026 में भारत ने हमलावरों के हाथों अपना पहला पत्रकार खोया है। बीती 28 अप्रैल 2026 को आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में ‘आंध्र ज्योति’ अखबार से जुड़े 40 वर्षीय तेलुगू पत्रकार वी. जगनमोहन रेड्डी की सुबह की सैर के दौरान बदमाशों ने हत्या कर दी। ‘इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन’ (IJU) के मुताबिक, यह हमला इलाके में सक्रिय चंदन तस्करों के खिलाफ खबर लिखने के बदले में किया गया था। जिनेवा के वैश्विक मीडिया सुरक्षा संगठन ‘प्रेस एम्बलम कैंपेन’ (PEC) ने भी इस पर चिंता जताते हुए हत्यारों को कड़ी सजा देने की मांग की है। 1 जनवरी 2026 से अब तक दुनिया भर में मारे गए 28 मीडियाकर्मियों में जगनमोहन भी एक पीड़ित बने।
करीब छह करोड़ की आबादी वाले नॉर्थईस्ट में पत्रकारों पर आखिरी बड़ा हमला वर्ष 2017 में त्रिपुरा में हुआ था, जहां शांतनु भौमिक और सुदीप दत्ता भौमिक की हत्या कर दी गई थी। इससे पहले 2013 में भी बांग्लादेश सीमा से सटे इसी राज्य के अगरतला में एक बंगाली अखबार के दफ्तर के अंदर सुजीत भट्टाचार्य, रंजीत चौधरी और बलराम घोष की बेरहमी से हत्या हुई थी।
असम और मणिपुर भी अतीत में ऐसे हमलों के गवाह रहे हैं, जहां रायहानुल नयुम और द्विजमणि नानाओ सिंह जैसे पत्रकार अपराधियों के निशाने पर आए। अकेले असम में साल 1987 से लेकर अब तक 25 से अधिक मीडियाकर्मी अपनी जान गंवा चुके हैं। इस खूनी इतिहास के बाद पिछले आठ सालों से हिंसा का थमना एक बड़ा बदलाव है। भले ही अपराधियों की गोलियों और हथियारों से नॉर्थईस्ट के पत्रकार सुरक्षित रहे हों, लेकिन कोरोना महामारी (Covid-19) ने यहां के मीडिया जगत को गहरा जख्म दिया। इस महामारी के दौरान पूरे देश में करीब 300 पत्रकारों की जान गई, जिनमें से 20 से अधिक अकेले नॉर्थईस्ट के थे।
इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा नुकसान असम को हुआ, जबकि अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम और सिक्किम में राहत रही कि वहां किसी पत्रकार की कोरोना से मृत्यु नहीं हुई। असम ने इस दौरान डॉ. लक्ष्मी नंदन बोरा और होमेन बोरगोहेन जैसी दो बड़ी साहित्यिक व मीडिया हस्तियों को खो दिया। इसके अलावा गुवाहाटी के रंटू दास, ग्रामीण पत्रकार धनेश्वर राभा, असीम दत्ता, गुलाब सैकिया, आयुष्मान दत्ता, जादू चुटिया, शिवचरण कलिता, रुबुल दिहिंगिया और हुमेश्वर हीरा भी इसके शिकार बने। दिल्ली में काम कर रहे असमिया पत्रकार कल्याण बरुआ और उनकी पत्नी नीलाक्षी भट्टाचार्य की तो 24 घंटे के भीतर ही कोरोना से मौत हो गई थी। वहीं दिल्ली में ही कार्यरत अनिर्बान बोरा ने भी वायरस के आगे दम तोड़ दिया।
त्रिपुरा के जितेंद्र देबबर्मा, तन्मय चक्रवर्ती, गौतम दास, माणिक लाल दास और मणिपुर के सगोलसेम हेमंत, साइखोम शांति कुमार, थोतशांग शैजा, लैरेनजम बिजेन सिंह तथा मेघालय के सिंडोर सिंह सिएम भी कोरोना की वजह से दुनिया छोड़ गए। केंद्र सरकार और देश के कई अन्य राज्यों ने कोरोना से जान गंवाने वाले पत्रकारों के परिवारों की आर्थिक मदद की, लेकिन नॉर्थईस्ट के राज्यों का रुख इस मामले में उदासीन रहा।
जहां एक तरफ ओडिशा सरकार ने पीड़ित पत्रकार परिवारों को 15-15 लाख रुपये, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु व पंजाब ने 10-10 लाख रुपये, आंध्र प्रदेश व छत्तीसगढ़ ने 5-5 लाख, बिहार ने 4 लाख और तेलंगाना ने 2 लाख रुपये का मुआवजा दिया; वहीं असम सरकार ने शुरुआत में पत्रकारों को फ्रंटलाइन वॉरियर्स की तरह 50 लाख रुपये का बीमा देने का वादा करने के बाद पूरी तरह चुप्पी साध ली। पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों ने भी प्रभावित पत्रकार परिवारों की सुध लेने में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई।