नाहन : हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर के औद्योगिक शहर पांवटा साहिब में यमुना नदी के तट के समीप स्थित ‘शिव पातालेश्वर महादेव मंदिर’ केवल अगाध श्रद्धा का केंद्र नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर कई ऐसे अलौकिक रहस्य समेटे हुए है जिसे जानकर हर कोई हैरान रह जाता है। स्थानीय मान्यताओं और प्राचीन इतिहास के पन्नों को पलटें तो इस मंदिर का संबंध महान योग गुरु ऋषि पतंजलि से लेकर द्वापर युग के पांडवों तक से जुड़ा हुआ है।
जब ऋषि पतंजलि की तपस्या से प्रकट हुए भोलेनाथ
इस पावन धाम के नामकरण और इतिहास को लेकर एक बेहद प्राचीन और खास मान्यता है। कहा जाता है कि सदियों पहले इस स्थान पर बेहद घना और डरावना जंगल हुआ करता था। उस दौर में महान ऋषि पतंजलि ने भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए इसी घने जंगल के बीच घोर तपस्या की थी। ऋषि की अगाध भक्ति और तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव यहाँ साक्षात प्रकट हुए और भक्तों के कल्याण के लिए शिवलिंग के रूप में यहीं विराजमान हो गए। ऋषि पतंजलि के नाम के कारण ही इस पावन स्थान का नाम समय के साथ बदलते-बदलते ‘पातालेश्वर महादेव’ पड़ा।

हर साल बढ़ती है स्वयंभू शिवलिंग की ऊंचाई!
इस मंदिर का सबसे बड़ा और चमत्कारी रहस्य यहाँ स्थापित स्वयंभू शिवलिंग से जुड़ा है। स्थानीय लोगों और मंदिर की देखरेख करने वालों का दृढ़ विश्वास है कि इस प्राचीन शिवलिंग की ऊंचाई हर साल अपने आप थोड़ी बढ़ जाती है। प्रकृति के इस अद्भुत चमत्कार को देखने और महादेव के इस जीवंत रूप के दर्शन करने के लिए साल भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। लोग इस बढ़ते शिवलिंग को साक्षात शिव की उपस्थिति का प्रमाण मानते हैं।
द्वापर युग में पांडवों ने भी टेका था मत्था
ऋषि पतंजलि की तपस्थली होने के साथ-साथ इस मंदिर का एक नाता महाभारत काल से भी जुड़ता है। एक अन्य स्थापित मान्यता के अनुसार, अपने अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने भी इस क्षेत्र में कुछ समय बिताया था। इस प्रवास के दौरान पांडवों ने इस घने जंगल के बीच स्थित स्वयंभू शिवलिंग की खोज की और यहाँ पर भगवान शिव शंकर की विशेष पूजा-अर्चना कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया था।
आज के समय में जब लोग शांति और चमत्कारों की खोज में उत्तराखंड या अन्य सुदूर पहाड़ी क्षेत्रों का रुख करते हैं, उनके लिए सिरमौर के पांवटा साहिब में स्थित यह पातालेश्वर महादेव मंदिर अध्यात्म, इतिहास और अनसुलझे रहस्यों का एक सजीव प्रमाण है।