नाहन : देश की सीमाओं और सैन्य अस्पतालों में अपनी सेवाएं देने वाली मिलिट्री नर्सिंग सर्विस (MNS) के लिए न्यायपालिका की ओर से एक ऐतिहासिक निर्णय सामने आया है। लंबे समय से चली आ रही कानूनी लड़ाई और मांग के बाद, अब सेना से सेवानिवृत्त होने वाली MNS महिला अधिकारियों को आधिकारिक तौर पर ‘एक्स-सर्विसमैन’ (पूर्व सैनिक) का दर्जा देने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने उन सभी भ्रांतियों और तकनीकी बाधाओं को दूर कर दिया है, जिनकी वजह से नर्सिंग अधिकारियों को सेवानिवृत्ति के बाद अन्य सैन्य कर्मियों के समान अधिकार नहीं मिल पा रहे थे।
इस फैसले का सबसे बड़ा प्रभाव सरकारी नौकरियों में मिलने वाले आरक्षण पर पड़ेगा। अब MNS से रिटायर होने वाली कर्मियों को केंद्र और राज्य सरकार की नौकरियों में पूर्व सैनिकों के लिए निर्धारित कोटा प्राप्त होगा। विशिष्ट रूप से, उन्हें ग्रुप-सी की नौकरियों में 10 प्रतिशत और ग्रुप-डी की श्रेणियों में 20 प्रतिशत आरक्षण का लाभ मिलेगा। यह प्रावधान न केवल उनके करियर के दूसरे पड़ाव को सुरक्षित करेगा, बल्कि उन्हें समाज में वही सम्मान और गरिमा प्रदान करेगा जो एक पूर्व सैनिक को मिलती है।

सैनिक कल्याण बोर्ड सिरमौर के उपनिदेशक मेजर दीपक धवन ने इस विषय पर प्रकाश डालते हुए बताया कि MNS कोर का इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है। वर्ष 1950 में गठित हुई यह कोर आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल सर्विसेज (AFMS) के तहत काम करती है और इसके सदस्य थल सेना, नौसेना व वायु सेना के अस्पतालों में अपनी सेवाएं देते हैं। मेजर धवन ने याद दिलाया कि ये नर्सिंग अधिकारी केवल अस्पतालों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि युद्ध के दौरान अग्रिम क्षेत्रों में भी तैनात रही हैं और देश की रक्षा में कई अधिकारियों ने अपना सर्वोच्च बलिदान भी दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद पूरे सशस्त्र बल परिवार में खुशी की लहर देखी जा रही है। सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न केवल समानता के संवैधानिक अधिकार को मजबूत करता है, बल्कि यह उन हजारों महिला अधिकारियों के कठिन परिश्रम और समर्पण का सम्मान है जो रात-दिन सैनिकों के स्वास्थ्य और जीवन की रक्षा में जुटी रहती हैं। अब इस दर्जे के मिलने से उन्हें कैंटीन, स्वास्थ्य योजना (ECHS) और अन्य कल्याणकारी सुविधाओं में भी स्पष्ट कानूनी मान्यता प्राप्त होगी।