नाहन : जिला सिरमौर में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और लैब्स की कार्यप्रणाली पर एक के बाद एक कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। पहले जिला मुख्यालय नाहन में निजी प्रयोगशालाओं की भ्रामक रिपोर्टिंग का मामला गर्माया हुआ था, और अब उपमंडल पांवटा साहिब के सिविल अस्पताल से सरकारी तंत्र की एक बड़ी लापरवाही सामने आई है। इन दोनों मामलों ने यह साफ कर दिया है कि जिले में मरीजों की जांच रिपोर्ट और उनके आधार पर होने वाले इलाज के साथ कितना बड़ा खिलवाड़ हो रहा है।
ताज़ा मामला पांवटा साहिब की गुर्जर कॉलोनी से जुड़ा है। यहाँ की निवासी बबली देवी ने सिविल अस्पताल की लैब रिपोर्ट को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। बबली देवी ने बताया कि वह सिविल अस्पताल पांवटा साहिब में अपना फास्टिंग शुगर टेस्ट करवाने गई थीं। अस्पताल की लैब रिपोर्ट में उनका शुगर स्तर 360 mg/dL बताया गया। इतनी खतरनाक रिपोर्ट देखने के बाद वह बुरी तरह घबरा गईं।

सत्यता की जांच के लिए उन्होंने तुरंत एक निजी लैब में दोबारा टेस्ट करवाया, जहाँ उनका फास्टिंग शुगर स्तर मात्र 194 mg/dL आया। दोनों रिपोर्टों में जमीन-आसमान का अंतर देखकर जब बबली देवी फिर से सिविल अस्पताल पहुंचीं और लैब कर्मचारी से इसका कारण पूछा, तो कर्मचारी ने हैरान करने वाला खुलासा करते हुए कहा कि “लैब में इस्तेमाल की जा रही मशीन खराब है।”
इस पर पीड़ित ने तीखी आपत्ति जताते हुए सवाल उठाया कि यदि मशीन खराब थी तो मरीजों के टेस्ट क्यों किए जा रहे थे? यदि इस गलत रिपोर्ट (360 mg/dL) के आधार पर डॉक्टर उन्हें दवाइयों की भारी खुराक या इंसुलिन लिख देते, तो उनके स्वास्थ्य पर कोई भी जानलेवा असर पड़ सकता था।
यह जिला सिरमौर में कोई पहला मामला नहीं है। अभी कुछ ही दिन पहले जिला मुख्यालय नाहन में भी एक ऐसा ही विरोधाभास सामने आया था। वहाँ एक व्यक्ति की 22 अप्रैल की रिपोर्ट में एक नामी निजी लैब (Thyrocare) ने HbA1c को 4.3% बताया था, जबकि उसी दिन शहर की दूसरी प्रतिष्ठित लैब में परिणाम 7.3% (HbA1c) और फास्टिंग शुगर 152 mg% निकला था।
हद तो तब हो गई जब 6 मई को एक अन्य लैब (Life Care Foundation) की रिपोर्ट सामने आई, जिसने मेडिकल साइंस को ही उलझा दिया। इस तीसरी रिपोर्ट में फास्टिंग शुगर 142.4 mg/dL (हाई) दिखाई गई, लेकिन उसी खून के नमूने में HbA1c मात्र 4.6% (नॉर्मल) बताया गया। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, 142 फास्टिंग शुगर वाले व्यक्ति का 3 महीने का औसत (HbA1c) 4.6% होना वैज्ञानिक रूप से लगभग असंभव है।
नाहन के इस गंभीर मामले पर साक्ष्यों के साथ 24 अप्रैल को मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) कार्यालय को औपचारिक ईमेल भेजी गई थी, लेकिन दो महीने बीत जाने के बाद भी स्वास्थ्य विभाग ने इस पर पूरी तरह चुप्पी साध रखी है।
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि अगर इन मरीजों ने अपनी जागरूकता दिखाते हुए दूसरी जगह से क्रॉस-चेक न करवाया होता, तो क्या होता? चिकित्सा जगत में डॉक्टर पूरी तरह से लैब रिपोर्ट्स पर ही निर्भर होते हैं। यदि कोई मरीज सिविल अस्पताल की 360 वाली रिपोर्ट या निजी लैब की भ्रामक रिपोर्ट पर आंख मूंदकर भरोसा कर लेता, तो गलत परामर्श और हैवी ओवरडोज के कारण मरीज ‘हाइपोग्लाइसीमिया’ या ऑर्गन फेलियर जैसी जानलेवा स्थिति में पहुँच सकता था।
हालांकि पांवटा साहिब सिविल अस्पताल मामले में अस्पताल प्रशासन की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
निजी लैब्स की मनमानी और सरकारी अस्पतालों में ‘खराब मशीनों’ के सहारे बांटी जा रही रिपोर्ट्स के बीच आम नागरिक आखिर किस पर भरोसा करे? क्या स्वास्थ्य विभाग और प्रदेश सरकार इन प्रयोगशालाओं और अस्पतालों की मशीनों के ‘नियमित कैलिब्रेशन’ और ‘क्वालिटी कंट्रोल’ की कोई जवाबदेही तय करेगी, या जनता इसी तरह तकनीकी लापरवाही का शिकार होकर अपनी जान जोखिम में डालती रहेगी?