शिमला: हिमाचल प्रदेश राज्य कर्मचारी महासंघ ने राज्य सरकार द्वारा दिसंबर 2011 से पूर्व नियुक्त सेवारत शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) अनिवार्य किए जाने के फैसले का कड़ा विरोध किया है। महासंघ के प्रदेशाध्यक्ष नरेश कुमार ने इस निर्णय को हजारों शिक्षकों के साथ सरासर अन्याय बताया है। सरकार के नए आदेश के अनुसार, 31 अगस्त 2028 तक टीईटी पास करने की समय-सीमा तय की गई है। यह नियम विशेष रूप से उन टीजीटी, सीएंडवी, सीएचटी, एचटी और जेबीटी शिक्षकों पर लागू होगा जिन्होंने 1 सितंबर 2025 तक पांच साल या उससे अधिक की सेवा पूरी कर ली है और जो 1 सितंबर 2030 या उसके बाद सेवानिवृत्त होने वाले हैं।

महासंघ के अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि संगठन सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का पूरा सम्मान करता है और न्यायपालिका के निर्देशों का पालन करना सभी का दायित्व है। हालांकि, उन्होंने दलील दी कि जिन शिक्षकों की भर्ती उस समय के प्रचलित नियमों के तहत हुई थी, उन पर वर्षों बाद नए प्रावधानों को पिछली तारीख से लागू करना किसी भी तरह से न्यायसंगत नहीं है। ये शिक्षक पिछले कई सालों से पूरी निष्ठा के साथ सरकारी स्कूलों में सेवाएं दे रहे हैं और नियुक्ति के समय ऐसी कोई शर्त नहीं थी।
संसद में संशोधन लाकर छूट देने की मांग
इस गंभीर मुद्दे को लेकर हिमाचल प्रदेश राज्य कर्मचारी महासंघ ने भारत सरकार के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को एक ज्ञापन भेजा है। ज्ञापन के माध्यम से मांग की गई है कि संसद में जरूरी विधायी संशोधन या विशेष कानूनी प्रावधान लाकर दिसंबर 2011 से पहले के सभी सेवारत शिक्षकों को टीईटी की इस अनिवार्यता से पूरी तरह छूट दी जाए। महासंघ का कहना है कि टीईटी से जुड़े नए नियम केवल भविष्य में भर्ती होने वाले शिक्षकों पर ही लागू होने चाहिए।
महासंघ ने केंद्र और राज्य सरकार से ऐसे संवेदनशीलता भरे समाधान की उम्मीद जताई है जिससे अदालत के आदेश का सम्मान भी रहे और पुराने शिक्षकों के हितों की रक्षा भी हो सके। संगठन ने मांग उठाई है कि किसी भी सेवारत शिक्षक की नौकरी, वेतन, वरिष्ठता या प्रमोशन पर इस नियम का कोई बुरा असर नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि यह मामला न सिर्फ शिक्षकों के अधिकारों का है, बल्कि प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था और हजारों परिवारों की आजीविका से भी जुड़ा है।
हिमाचल प्रदेश राज्य कर्मचारी महासंघ के प्रदेशाध्यक्ष नरेश कुमार ने कहा कि यह केवल शिक्षकों का मुद्दा नहीं, बल्कि प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था और हजारों परिवारों की आजीविका से जुड़ा विषय है। सरकार को संवेदनशीलता और न्यायसंगत दृष्टिकोण अपनाते हुए शीघ्र सकारात्मक निर्णय लेना चाहिए।