नई दिल्ली: कई महीनों की अनिश्चितता के बाद प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) को अपना चेयरमैन तो मिल गया है, लेकिन 13 कामकाजी पत्रकारों (एडिटर और नॉन-एडिटर दोनों श्रेणियों में) की जगह अभी भी खाली है। एक कानूनी, अर्ध-न्यायिक और स्वतंत्र संस्था के रूप में पीसीआई की स्थापना मूल रूप से 1966 में प्रेस काउंसिल अधिनियम 1965 के तहत की गई थी और बाद में 1979 में इसे प्रेस काउंसिल अधिनियम 1978 के तहत पुनर्गस्थापित किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य भारत में समाचार पत्रों और समाचार एजेंसियों के पत्रकारिता मानकों को बनाए रखना और उनमें सुधार करना है।

उल्लेखनीय है कि जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई, जिन्होंने 17 जून 2022 से 16 दिसंबर 2025 तक पीसीआई चेयरपर्सन के रूप में अपनी सेवाएं दी थीं, उन्होंने 24 अप्रैल 2026 को एक बार फिर से इस पद का कार्यभार संभाल लिया है। सुप्रीम कोर्ट की इस सेवानिवृत्त न्यायाधीश को तीन साल के एक और कार्यकाल के लिए नामित किया गया है, लेकिन इसके बावजूद कामकाजी पत्रकारों का कोटा अब भी रिक्त है क्योंकि 15वीं काउंसिल को पूरा करने के लिए एडिटर के अलावा अन्य पेशेवर पत्रकारों के सात और एडिटर-पत्रकारों के छह सदस्यों का चुना जाना अभी शेष है।
संसदीय चर्चा और कानूनी गतिरोध
कुछ महीने पहले, राज्यसभा सदस्य सस्मित पात्रा ने नई दिल्ली में केंद्र सरकार से पुरजोर आग्रह किया था कि लोकतांत्रिक सिद्धांतों की रक्षा और मीडिया की जवाबदेही को सुदृढ़ करने के लिए पीसीआई की मौजूदा काउंसिल का गठन जल्द से जल्द पूरा किया जाए। संसद के उच्च सदन में बोलते हुए बीजू जनता दल के नेता ने इस बात पर प्रकाश डाला था कि 14वीं काउंसिल, जिसका कार्यकाल 5 अक्टूबर 2024 को समाप्त हो चुका था, के बाद एक पूर्ण काउंसिल का होना स्वतंत्र, निष्पक्ष और जिम्मेदार प्रेस के लिए अत्यंत आवश्यक है। पात्रा ने नए चेयरमैन की नियुक्ति पर विशेष जोर दिया था क्योंकि पीसीआई पिछले साल 17 दिसंबर से बिना प्रमुख के संचालित हो रही थी। इससे पहले, केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने संसद को अवगत कराया था कि कामकाजी पत्रकार श्रेणी के तहत इन सदस्यों के नामांकन की प्रक्रिया दिल्ली उच्च न्यायालय में विचाराधीन है।
वर्तमान में पीसीआई के कार्यरत सदस्यों में डॉक्टर सुधांशु त्रिवेदी, बृज लाल (राज्यसभा सांसद), डॉक्टर संबित पात्रा, नरेश गणपत म्हस्के, काली चरण मुंडा (लोकसभा सांसद), प्रोफेसर अश्विनी के. महापात्रा (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग), मनन कुमार मिश्रा (बार काउंसिल ऑफ इंडिया), डॉक्टर के. श्रीनिवासराव (साहित्य अकादमी), सुधीर कुमार पांडा, एम.वी. श्रेयम्स कुमार, गुरिंदर सिंह, अरुण कुमार त्रिपाठी, ब्रज मोहन शर्मा और आरती त्रिपाठी विभिन्न मीडिया सोसाइटियों और संघों के प्रतिनिधि के रूप में शामिल हैं।
विवाद की मुख्य वजह और कानूनी संघर्ष
विभिन्न बाधाओं के बावजूद काम करने वाले पत्रकारों (जैसे एडिटर्स, अन्य पत्रकार और समाचार एजेंसी प्रबंधन) का प्रतिनिधित्व करने वाली शेष सीटों को भरने के प्रयास जारी हैं। इस 29 सदस्यीय मीडिया वॉचडॉग की 15वीं काउंसिल का कार्यकाल 4 अक्टूबर 2027 को समाप्त होना है, लेकिन पेशेवर पत्रकारों का प्रतिनिधित्व करने वाले 13 पद अभी भी खाली हैं। यह संकट तब उत्पन्न हुआ जब कुछ प्रमुख राष्ट्रीय पत्रकार संगठनों ने पीसीआई के नियमों में किए गए उस बदलाव का विरोध किया जिसके तहत काम करने वाले पत्रकारों की राष्ट्रीय यूनियन के बजाय विभिन्न प्रेस क्लबों से सदस्यों का चुनाव किया जाना था।
विरोध करने वाले संगठनों का तर्क है कि प्रेस क्लब मूल रूप से सामाजिक और मनोरंजन गतिविधियों के लिए बने संगठन होते हैं और उनका दायरा अमूनन किसी विशिष्ट क्षेत्र, शहर या कस्बे तक ही सीमित होता है। इसके अलावा, कई प्रेस क्लब अपनी पहुंच और प्रभाव बढ़ाने के लिए गैर-पत्रकारों (जैसे शिक्षाविदों, लेखकों, फिल्मी हस्तियों और राजनयिकों) को भी अपनी सदस्यता प्रदान करते हैं, जिससे यह आशंका रहती है कि उनके प्रतिनिधि कई अहम अवसरों पर पेशेवर मीडिया कर्मियों के वास्तविक हितों और मुद्दों का प्रभावी ढंग से प्रतिनिधित्व नहीं कर पाएंगे।
स्पष्ट शब्दों में कहें तो, कोई भी प्रेस क्लब या मीडिया क्लब पूरे देश का समग्र प्रतिनिधित्व करने वाला संगठन नहीं हो सकता, क्योंकि उसमें विशाल देश के दूरदराज के क्षेत्रों से आए प्रतिनिधि शामिल नहीं होते। इसके विपरीत, मान्यता प्राप्त पत्रकार यूनियनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से जमीनी स्तर के सदस्य होते हैं। इसी न्याय की मांग को लेकर इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन और ऑल इंडिया वर्किंग न्यूज़ कैमरामैन एसोसिएशन जैसे संगठनों ने अदालत का दरवाजा भी खटखटाया था।
डिजिटल युग में पीसीआई के अधिकार क्षेत्र और दायरे पर सवाल
जब पीसीआई कई महीनों तक बिना चेयरमैन के रही, तो यह एक गंभीर सवाल बन गया कि भारत के विशाल प्रिंट मीडिया समुदाय जिसमें ‘रजिस्ट्रार ऑफ न्यूजपेपर्स फॉर इंडिया’ द्वारा मान्यता प्राप्त 1,00,000 से अधिक प्रकाशन शामिल हैं की देखरेख कौन कर रहा था। पीसीआई के पास किसी भी समाचार पत्र, एजेंसी या पत्रकार के खिलाफ पेशेवर कदाचार (जिससे पत्रकारिता के मानदंडों का स्तर गिरता हो) की शिकायतें स्वीकार करने का अधिकार है, हालांकि इसके पास नियमों के उल्लंघन के मामले में प्रिंट आउटलेट्स और संबंधित पत्रकारों को दंडित करके अपने दिशा-निर्देशों को लागू करने की शक्ति काफी सीमित है।
अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं की भारी संख्या के अलावा, एक अरब से अधिक आबादी वाला यह देश लगभग 400 सैटेलाइट न्यूज़ चैनलों के साथ-साथ लाखों डिजिटल पोर्टल्स, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और डिजिटल आउटलेट्स का भी बड़ा केंद्र बन चुका है। हालांकि, ये आधुनिक तकनीकी आधारित मीडिया प्लेटफॉर्म अभी भी पीसीआई के प्रत्यक्ष दाय रे से बाहर हैं। चूंकि पीसीआई को प्रेस की स्वतंत्रता सुनिश्चित करते हुए सरकारी नीतियों और कार्यों पर निष्पक्ष टिप्पणी करने का अधिकार प्राप्त है, इसलिए अब देश भर में यह मांग तेजी से उठ रही है कि सभी प्रमुख न्यूज़ चैनलों, रेडियो और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भी पीसीआई के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत लाया जाए। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या भारतीय मीडिया जगत को जल्द ही अधिक व्यापक अधिकारों और विस्तारित दायरे वाली एक सशक्त एवं पूर्ण रूप से क्रियाशील प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया मिल सकेगी।