हिमाचल मुख्यमंत्री के नेतृत्व में राज्य को मिले ऐतिहासिक कानूनी और वित्तीय हक

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By Hills Post

शिमला: हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने प्रदेश के हितों से जुड़े लंबे समय से लंबित मामलों में प्रभावी और मजबूत पैरवी कर राज्य के अधिकारों की रक्षा का एक नया उदाहरण पेश किया है। वर्षों से कानूनी और प्रशासनिक उलझनों में फंसे कई महत्वपूर्ण मामलों में राज्य सरकार ने उनके कुशल नेतृत्व में उल्लेखनीय सफलताएं दर्ज की हैं। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि वे कभी भी प्रदेश के हितों से समझौता नहीं करेंगे और प्रदेशवासियों का हित ही उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है।

वर्ष 2002 से कानूनी विवाद में उलझे वाइल्ड फ्लावर हॉल मामले में प्रदेश सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष मजबूत तथ्य और साक्ष्य रखे, जिसके ऐतिहासिक फैसले के बाद यह बेशकीमती संपत्ति पुनः राज्य सरकार के नियंत्रण में आ गई। राज्य सरकार ने इस निर्णय के अनुसार 25 करोड़ रुपये का भुगतान किया और वर्तमान में इस संपत्ति से हिमाचल प्रदेश को प्रतिवर्ष 20 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व प्राप्त हो रहा है। इसी प्रकार 1,045 मेगावाट क्षमता की कड़छम-वांगतू जलविद्युत परियोजना की रॉयल्टी के मामले में भी राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। अदालत के आदेश के बाद हिमाचल प्रदेश को मिलने वाली मुफ्त बिजली की हिस्सेदारी 12 प्रतिशत से बढ़ाकर 18 प्रतिशत कर दी गई है, जिससे राज्य के खजाने में प्रतिवर्ष लगभग 150 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय जुड़ रही है।

लगभग 15,000 करोड़ रुपये की लागत वाली किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना (422 मेगावाट) में मुख्यमंत्री ने हिमाचल के हितों की पुरजोर रक्षा की। पूर्व सरकार द्वारा राज्य के हिस्से के रूप में स्वीकार किए गए 800 करोड़ रुपये के प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए सुक्खू सरकार ने निरंतर प्रयास किए, जिसके फलस्वरूप केंद्र सरकार ने लाभार्थी राज्यों द्वारा हिमाचल के हिस्से की 2,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वहन करने पर सैद्धांतिक सहमति दी। टौंस नदी पर प्रस्तावित इस परियोजना से हिमाचल को प्रतिवर्ष लगभग 100 करोड़ यूनिट बिजली मिलेगी, जिसकी अनुमानित वार्षिक कीमत लगभग 600 करोड़ रुपये होगी।

इसके अलावा, मुख्यमंत्री विभिन्न राष्ट्रीय मंचों पर हिमाचल के अन्य लंबित हकों को भी प्रमुखता से उठा रहे हैं। भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) से सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बावजूद लंबित 4,200 करोड़ रुपये के वित्तीय बकाए और 13,066 मिलियन यूनिट बिजली के अधिकार की मांग मजबूती से की जा रही है। साथ ही पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 के तहत चंडीगढ़ की भूमि एवं परिसंपत्तियों में हिमाचल प्रदेश के 7.19 प्रतिशत हिस्से का वैध दावा भी पेश किया गया है। वहीं शानन जलविद्युत परियोजना की लीज अवधि समाप्त होने के बावजूद पंजाब सरकार द्वारा इसे हस्तांतरित न किए जाने के कारण मामला वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। राज्य सरकार की यह सक्रिय पैरवी यह सिद्ध करती है कि मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू प्रदेश के संसाधनों और दीर्घकालिक हितों की सुरक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।

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