सोलन: शूलिनी यूनिवर्सिटी के योगानंद सेंटर ऑफ़ स्पिरिचुअल साइंसेज के विशेष सहयोग से विश्वविद्यालय के फैकल्टी ऑफ़ लीगल साइंसेज द्वारा शुक्रवार को इंटरफेथ हार्मनी सिम्पोजियम का भव्य आयोजन किया गया। इस उच्च स्तरीय संगोष्ठी में देश के जाने-माने कानून विशेषज्ञों, सेवानिवृत्त राजनयिकों, पूर्व सैन्य अधिकारियों, प्रतिष्ठित शिक्षाविदों और विचारकों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य तेजी से बदलते और विविधतापूर्ण हो रहे आधुनिक समाज में सहानुभूति, करुणा, वैश्विक शांति और सामाजिक एकजुटता को बढ़ावा देना था।

कार्यक्रम के मुख्य विषय की पृष्ठभूमि रखते हुए पूर्व आईएएस अधिकारी और प्रख्यात प्रेरक वक्ता विवेक अत्रे ने “हमारे समय के विरोधाभास” विषय पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने समाज में बढ़ रहे वैचारिक विभाजनों से ऊपर उठने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि आज के दौर में सोशल मीडिया, पॉडकास्ट और शॉर्ट डिजिटल कंटेंट के बढ़ते प्रभाव के कारण वैचारिक ध्रुवीकरण तेजी से बढ़ा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस वैचारिक टकराव से निपटने और समाज में बेहतर आपसी समझ विकसित करने के लिए प्रत्येक नागरिक में आत्म-जागरूकता, आलोचनात्मक सोच और एक व्यापक, उदार दृष्टिकोण का होना बेहद जरूरी है।
संगोष्ठी के पहले तकनीकी सत्र का संचालन लेफ्टिनेंट जनरल (डॉ.) के. जे. सिंह (सेवानिवृत्त) द्वारा किया गया, जिसका विषय “सशस्त्र बल और नागरिक समाज के बीच अंतर-धार्मिक संवाद” रहा। चर्चा में भाग लेते हुए डॉ. मोहम्मद खालिद ने कहा कि भारतीय सशस्त्र बलों ने हमेशा सर्वोच्च धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को बनाए रखा है और सेना द्वारा सभी धर्मों को दिया जाने वाला समान सम्मान नागरिक समाज के लिए एक महान मिसाल है। इसी सत्र में लेफ्टिनेंट कर्नल रविंदर जीत रंधावा (सेवानिवृत्त) ने अपने सैन्य अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि सीमाओं पर देश की रक्षा करते समय भारतीय सैनिक धर्म, जाति, नस्ल या क्षेत्रीय पृष्ठभूमि के अंतर से बहुत ऊपर उठकर काम करते हैं, और यही समावेशन व आपसी सम्मान भारतीय सेना की सबसे मजबूत नींव है।
संगोष्ठी के दूसरे सत्र का विषय “सभी धर्म सहानुभूति, करुणा, प्रेम और शांति के धर्म हैं” रखा गया, जिसका संचालन ‘इंटरफेथ’ के उपाध्यक्ष गुरप्रीत सिंह द्वारा किया गया। सत्र में गुरप्रीत सिंह ने अपनी व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं से ऊपर उठकर एक-दूसरे के विश्वास का सम्मान करने को ही सच्ची मानवता बताया। चर्चा को आगे बढ़ाते हुए जस्टिस के. एस. गरेवाल (सेवानिवृत्त) ने कहा कि संपूर्ण विश्व में मानवता एक है और दुनिया के सभी धर्म अंततः मानव कल्याण के लिए ही बने हैं। वहीं राजदूत अशोक कुमार, आईएफएस (सेवानिवृत्त) ने कूटनीतिक और सामाजिक स्तर पर मतभेदों को भुलाकर ऐसे मूल्यों को अपनाने पर जोर दिया जो अलग-अलग संस्कृतियों के लोगों को आपस में जोड़ते हैं।
इसी सत्र में शूलिनी यूनिवर्सिटी के चांसलर प्रो. (डॉ.) पी. के. खोसला ने अच्छे कामों और निस्वार्थ सेवा के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि धर्म पूरी तरह से एक व्यक्तिगत विषय है, इसलिए इंसान को केवल दूसरों की मदद करने और समाज में सकारात्मक योगदान देने पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि दया, करुणा और ईमानदारी ऐसे शाश्वत मूल्य हैं जो सभी धर्मों में समान हैं। चर्चा को समेटते हुए जस्टिस सबीहुल हसनैन (सेवानिवृत्त) ने कहा कि समाज में शांति के लिए लोगों को पहले अपने स्वयं के धर्म को गहराई से समझना होगा, क्योंकि सही धार्मिक समझ ही दूसरों के प्रति सम्मान और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करती है। उन्होंने विवादों को सुलझाने में सामूहिक समझ के महत्व पर भी बल दिया।
संगोष्ठी के अंत में सभी विद्वानों और वक्ताओं ने सर्वसम्मति से इस बात को स्वीकार किया कि भले ही दुनिया के तमाम धर्मों के रीति-रिवाज, पूजा पद्धतियां और बाहरी स्वरूप अलग-अलग हों, लेकिन उन सभी के भीतर बहने वाली करुणा, शांति, सहनशीलता और सह-अस्तित्व की अंतर्धारा एक समान है। इस गरिमामयी राष्ट्रीय कार्यक्रम का कुशल संचालन और मंचन लीगल साइंसेज़ फैकल्टी की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर युगाशा और निधि सिंह द्वारा किया गया। कार्यक्रम का समापन कर्नल डी. एस. चीमा (रिटायर्ड) के धन्यवाद प्रस्ताव और समापन भाषण के साथ हुआ, जिसमें उन्होंने दृढ़ता से कहा कि इस संगोष्ठी ने वैश्विक समाज को यह संदेश दिया है कि एक समावेशी, प्रगतिशील और सौहार्दपूर्ण समाज के निर्माण के लिए आपसी सम्मान और करुणा ही एकमात्र मार्ग हैं।