नाहन: अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त लोक कलाकार, शोधार्थी एवं वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर डॉ. जोगिन्दर हाब्बी का चयन देश के सर्वोच्च सांस्कृतिक सम्मानों में से एक संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार 2025 के लिए किया गया है। लोक नृत्य एवं देवभूमि की समृद्ध लोक संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन तथा वैश्विक स्तर पर प्रचार-प्रसार के क्षेत्र में उनके अद्वितीय और उल्लेखनीय योगदान के लिए यह प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सम्मान महामहिम राष्ट्रपति द्वारा एक विशेष समारोह में प्रदान किया जाएगा।

डॉ. जोगिन्दर हाब्बी पिछले 30 से अधिक वर्षों से हिमाचल प्रदेश की उन लोक विधाओं को बचाने में समर्पित भाव से जुटे हैं, जो आधुनिकता की चकाचौंध में दम तोड़ रही थीं। उन्होंने अपने सांस्कृतिक गुरु पद्मश्री विद्यानंद सरैक की छत्रछाया में हिमाचल की कई अत्यंत दुर्लभ और पारंपरिक विधाओं पर गहन शोध एवं ऐतिहासिक अध्ययन किया जिसमें ठोडा (पारंपरिक युद्ध नृत्य), हाटी की नाटी, सिंहटू नृत्य, बढाल्टू नृत्य तथा डग्याली नाच शामिल हैं ।
डॉ. हाब्बी ने इन लोक कलाओं के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ किए बिना इन्हें एक उत्कृष्ट मंचीय रूप प्रदान किया। उनके इसी भगीरथ प्रयास के चलते आज इन लुप्तप्राय लोक नृत्यों को आम जनमानस के बीच पुनः व्यापक लोकप्रियता और एक नया जीवन मिला है।
सांस्कृतिक चेतना को जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए डॉ. हाब्बी ने चूड़ेश्वर सांस्कृतिक मंडल एवं आसरा संस्था जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं की स्थापना की। इन संस्थाओं के माध्यम से उन्होंने ग्रामीण पृष्ठभूमि के सैकड़ों युवाओं को तराशकर प्रोफेशनल कलाकार बनाया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने अपने निजी संसाधनों से जालग में ‘हाब्बी मानसिंह कला केन्द्र’ की स्थापना की है, जहाँ आज भी नई पीढ़ी को लोक नृत्य, लोकनाट्य (करयाला/स्वांग) और पारंपरिक मुखौटा निर्माण कला का नियमित प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
डॉ. हाब्बी के कुशल निर्देशन में हिमाचली कलाकारों ने सात समंदर पार देश का तिरंगा लहराया है। उनके नेतृत्व में सांस्कृतिक दलों ने बुल्गारिया, मैसेडोनिया, ग्रीस और तुर्की सहित कई यूरोपीय देशों में भारतीय लोक कला की सफल प्रस्तुतियां दीं। हिमाचल के पारंपरिक युद्ध नृत्य ‘ठोडा’ को पहली बार अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने का ऐतिहासिक श्रेय भी डॉ. हाब्बी को ही जाता है।
सांस्कृतिक जगत में डॉ. हाब्बी के अभूतपूर्व कार्यों को राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर बड़ी मान्यताएं मिली हैं। उनके अद्वितीय सांस्कृतिक नेतृत्व के लिए उनका नाम इण्डिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स तथा वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज हो चुका है। वे लोक संस्कृति पर आधारित कई शोध-पत्र प्रकाशित कर चुके हैं। वे दो ऐतिहासिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं, जबकि उनकी तीन अन्य पुस्तकें वर्तमान में प्रकाशनाधीन हैं। वे लोक कलाओं के दस्तावेजीकरण के लिए 5 डॉक्युमेंट्री और ‘ठोडा’ विषय पर एक विशेष टेलीफिल्म का सफल निर्देशन कर चुके हैं। साथ ही देश के बड़े सांस्कृतिक उत्सवों में मुख्य कोरियोग्राफर की भूमिका निभा चुके हैं।
इस सर्वोच्च राष्ट्रीय पुरस्कार की घोषणा के बाद डॉ. जोगिन्दर हाब्बी ने सबसे पहले अपने आध्यात्मिक गुरु सतगुरु मधु परमहंस साहिब जी के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त की। उन्होंने अत्यंत शालीनता से कहा कि यह सम्मान मेरी कोई व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह देवभूमि हिमाचल प्रदेश की समृद्ध लोक कलाओं, मिट्टी की खुशबू और इसे जिंदा रखने में दिन-रात जुटे प्रदेश के तमाम छोटे-बड़े लोक कलाकारों व कला प्रेमियों के संघर्ष का सम्मान है।
उन्होंने संगीत नाटक अकादेमी का आभार जताते हुए इस बड़ी सफलता का पूरा श्रेय अपने गुरु पद्मश्री विद्यानंद सरैक और अपने दल के समर्पित कलाकारों को दिया। डॉ. हाब्बी को यह पुरस्कार मिलने की घोषणा से पूरे हिमाचल प्रदेश के कला जगत और विशेषकर सिरमौर जिले में जश्न का माहौल है।