नौणी यूनिवर्सिटी ने 210 महिलाओं को दिया खाद्य प्रसंस्करण का प्रशिक्षण

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By Hills Post

सोलन: डॉ यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी के खाद्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा राज्य के विभिन्न जिलों की पंचायतों में खाद्य प्रसंस्करण विषय पर सात ऑफ-कैंपस प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए। इन कार्यक्रमों में कुल 210 प्रतिभागियों ने भाग लिया, जिनमें अधिकांश महिलाएं रहीं। प्रत्येक पंचायत से लगभग 30 प्रतिभागियों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया।

ये प्रशिक्षण कार्यक्रम आर.के.वी.वाई. परियोजना तकनीकी हस्तक्षेपों के माध्यम से प्राकृतिक उत्पादों का उपयोग कर सतत आजीविका” के अंतर्गत आयोजित किए गए।

कार्यक्रमों का आयोजन जिला ऊना की थाना कलां और बहल पंचायतों, जिला हमीरपुर की रोहिण पंचायत, जिला शिमला की चांजू-चौपाल और पोलिया पंचायतों तथा जिला किन्नौर की कोठी-कश्मीर और कल्पा पंचायतों में किया गया। इस पहल का मुख्य उद्देश्य खाद्य प्रसंस्करण और स्थानीय कृषि उत्पादों के मूल्य संवर्धन में तकनीकी हस्तक्षेपों के माध्यम से सतत आजीविका के अवसरों को बढ़ावा देना था। प्रशिक्षणों में खाद्य प्रसंस्करण कौशल को बढ़ाने, लघु उद्यमिता को प्रोत्साहित करने, मूल्य संवर्धन संबंधी व्यावहारिक ज्ञान विकसित करने तथा स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को आय सृजन गतिविधियां शुरू करने के लिए सक्षम बनाने पर विशेष ध्यान दिया गया।

प्रशिक्षण कार्यक्रमों के दौरान प्रतिभागियों को मोटे अनाज (मिलेट्स) और स्थानीय उत्पादों के महत्व, उनके पोषण संबंधी लाभों तथा मूल्य संवर्धित उत्पादों की संभावनाओं के बारे में जानकारी दी गई। परियोजना के प्रधान अन्वेषक डॉ. अनिल कुमार वर्मा ने बताया कि वैज्ञानिक खाद्य प्रसंस्करण तकनीकों के माध्यम से उत्पादों की शेल्फ लाइफ, गुणवत्ता और बाजार मूल्य में वृद्धि की जा सकती है, जिससे आय और रोजगार के बेहतर अवसर उत्पन्न होते हैं।

प्रशिक्षण के दौरान मफिन, जैम, स्क्वैश, पास्ता तथा प्राकृतिक बायो-एंजाइम जैसे मूल्य संवर्धित उत्पादों के निर्माण का व्यावहारिक प्रदर्शन किया गया। प्रतिभागियों को खाद्य प्रसंस्करण तकनीकों और मूल्य संवर्धन विधियों का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हुआ।

कार्यक्रमों में उद्यमिता विकास से संबंधित विषयों जैसे लागत निर्धारण, विपणन रणनीतियां तथा उत्पादों की बेहतर बाजार क्षमता के लिए उचित पैकेजिंग और लेबलिंग के महत्व पर भी जानकारी दी गई। प्रतिभागियों को लघु खाद्य उद्योग स्थापित करने के लिए एफ.एस.एस.ए.आई.  लाइसेंस और पंजीकरण संबंधी जानकारी भी प्रदान की गई।

प्रतिभागियों को सूक्ष्मजीवों के कारण होने वाले नुकसान तथा सुरक्षित खाद्य उत्पादन में स्वच्छता के महत्व के बारे में भी जागरूक किया गया। इसके अतिरिक्त, अपशिष्ट पदार्थों के उपयोग से उप-उत्पाद विकसित करने तथा पर्यावरण अनुकूल बायो-एंजाइम के उपयोग के बारे में भी जानकारी दी गई।

महिला प्रतिभागियों ने प्रशिक्षण कार्यक्रमों में विशेष रुचि दिखाई और उनमें से कई पहले से ही स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हुई थीं। उन्हें बेहतर ब्रांडिंग और विपणन के माध्यम से अपने उद्यमों को मजबूत करने के लिए प्रेरित किया गया। प्रत्येक प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र वितरित किए गए। प्रतिभागियों ने इस पहल की सराहना की तथा आजीविका और आय बढ़ाने के लिए इन तकनीकों को अपनाने की इच्छा व्यक्त की।

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