सोलन: हालात इंसान की रफ्तार भले ही रोक लें, लेकिन अगर हौसला बुलंद हो तो कोई भी मुश्किल मंजिल को पाने से नहीं रोक सकती। सोलन जिला के ग्राम पंचायत जाबली के गांव लशां के युवा हिमांशु अत्री की संघर्ष और सफलता की यह कहानी हर उस व्यक्ति के लिए उम्मीद की एक किरण है, जो कठिन परिस्थितियों के आगे खुद को कमजोर समझने लगता है। हिमांशु ने यह साबित कर दिया है कि सपनों को पूरा करने के लिए शरीर की ताकत से कहीं ज्यादा मन के दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है।

दर्दनाक हादसा और संघर्ष का कठिन दौर
वर्ष 2021 में जब हिमांशु हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से डिफेंस स्टडीज में मास्टर्स कर रहे थे, तब एक सड़क कार हादसे ने उनकी जिंदगी की पूरी दिशा ही बदल दी। इस भयानक हादसे में उन्हें गंभीर स्पाइन इंजरी हुई, जिससे उनकी लोअर बॉडी डिसेबल हो गई। वह चार महीने तक पीजीआई चंडीगढ़ के आईसीयू और लंबे समय तक बिस्तर पर रहे। स्थिति इतनी विकट थी कि करीब दो वर्षों तक उन्हें फूडपाइप के जरिए खाना खाना पड़ा। अचानक आई इस त्रासदी ने उनकी जिंदगी को झकझोर कर रख दिया था, लेकिन उनके अडिग हौसले ने हार मानने से साफ इनकार कर दिया।
व्हीलचेयर पर बैठकर लिखी सफलता की इबारत
करीब दो साल तक जिंदगी और मौत के बीच कड़ा संघर्ष करने के बाद हिमांशु ने एक बार फिर किताबों का दामन थामा। शरीर भले ही साथ नहीं दे रहा था, लेकिन मन में आगे बढ़ने की गहरी जिद थी। उनके भाई सौरभ, बहन स्वाति और शैलजा ने उनका हर कदम पर हौसला बढ़ाया। घर से सड़क तक पहुंचने के लिए रास्ता ठीक न होने के कारण परिजन और गांव के युवा साथी उन्हें एक किलोमीटर तक स्ट्रेचर के सहारे उठाकर मुख्य सड़क तक पहुंचाते थे। इन तमाम शारीरिक और भौगोलिक चुनौतियों को पार करते हुए उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और हिंदी विषय में अपनी पहली ही कोशिश में प्रतिष्ठित NET (नेट) परीक्षा क्वालीफाई कर दिखाई।
माता-पिता का साथ और प्रेरणा
हिमांशु की इस असाधारण सफलता के पीछे उनके माता-पिता का असीम समर्थन रहा है। उनके पिता ओमप्रकाश एक सेवानिवृत्त शास्त्री अध्यापक हैं और माता प्रभा देवी गृहणी हैं, जिन्होंने हर मुश्किल घड़ी में उनका हौसला बढ़ाया और उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
हिमांशु अत्री की यह उपलब्धि सिर्फ एक परीक्षा पास करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन तमाम लोगों के लिए एक मजबूत संदेश है जो जीवन के किसी न किसी मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। उन्होंने अपने पैरों से नहीं, बल्कि अपने बुलंद हौसले से यह मुकाम हासिल कर यह दिखा दिया कि यदि इंसान अपने सपनों का हाथ थामे रहे, तो कोई भी हादसा या शारीरिक कमजोरी उसके कदमों को हमेशा के लिए नहीं रोक सकती।